Tuesday, March 3, 2020

भारत में कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण

भारत में कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण
भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका सैद्धांतिक रूप से पृथक है किंतु व्यावहारिक रूप से कार्यपालिका विधायिका का एक भाग है. और चूंकि कार्यपालिका हमेशा बहुमत में होती है, इसीलिए इस पर विधायिका का नियंत्रण कमजोर ही प्रतीत होता है.
संसदीय नियंत्रण
  • भारत के संविधान ने सरकार के संसदीय रूप की स्थापना की है जिसमें कार्यपालिका अपने कृत्यों के लिए संसद के प्रति जिम्मेदार होती है.
  • संसद, बहस और चर्चाओं के माध्यम से कार्यपालिका पर नियंत्रण करती है. इसके पास शून्य काल और प्रश्नकाल के दौरान छोटी चर्चाएं, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव, निंदा प्रस्ताव और कार्य स्थगन प्रस्ताव जैसे साधन है.
  • यह सरकारी आश्वासन संबंधी समिति, अधीनस्थ विधान संबंधी समिति, याचिका समिति जैसी अपनी समितियों की सहायता से कार्यपालिका की गतिविधियों का पर्यवेक्षण भी करती है.
  • मंत्री सामूहिक रूप से संसद के प्रति और विशिष्ट रूप से लोकसभा के प्रति जिम्मेदार होती है. उनकी सामूहिक जिम्मेदारी के साथ साथ व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी होती है, अर्थात प्रत्येक मंत्री अपने मंत्रालय के कुशल प्रशासन के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होता है. वे अपने पद पर तब तक बने रहते हैं जब तक उन्हें लोकसभा का विश्वास प्राप्त होता है.
  • संसदीय नियंत्रण की अप्रभावशीलता
    वास्तविकता में संसदीय नियंत्रण उतना प्रभावी नहीं होता है जितना कि उसे होना चाहिए. इसके लिए निम्नलिखित कारक जिम्मेदार है —
    • संसद के पास विशाल एवं जटिल प्रशासन को नियंत्रित करने का ना तो समय है और ना ही विशेषज्ञता.
    • संसद का वित्तीय नियंत्रण, अनुदान के लिए मांगों की तकनीकी प्रकृति द्वारा बाधित होता है जिसके लिए आर्थिक विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है.
    • लोक लेखा समिति जैसी वित्तीय समितियां केवल कार्योत्तर लेखापरीक्षा करती है, अर्थात वे व्यय होने के बाद उसकी परीक्षा करती है.
    • प्रत्यायोजित विधायन के विकास में विस्तृत कानून बनाने में संसद की भूमिका कम कर दी है और नौकरशाही की शक्तियों को बढ़ा दिया है.
    • राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश को का बार-बार प्रख्यापन संसद की विधान निर्माण शक्ति को कम कर देता है.
    • संसद में मजबूत और स्थिर विपक्ष का अभाव और संसदीय व्यवहार और नैतिकता में आई गिरावट भारत में प्रशासन पर विधाई नियंत्रण की प्रभावशीलता में योगदान किया है.
    संविधान की 10वीं अनुसूची के अंतर्गत महत्वपूर्ण प्रावधान
    संविधान की 10वीं अनुसूची का सूत्रपात 52 वें संशोधन से हुआ था, जिसमें विधायकों को दलबदल के आधार पर अयोग्य ठहराने की प्रक्रिया निर्धारित की गई थी. 51 वें संशोधन अधिनियम 2003 के अंतर्गत इसमें फिर से संशोधन किया गया था. दसवीं अनुसूची के मुख्य प्रावधान इस प्रकार है–
  • किसी सदन का सदस्य, जो किसी राजनीतिक दल से संबंध है, यदि वह स्वयं से अपने दल की सदस्यता का त्याग कर देता है या अपने दल के निर्देशों का पालन नहीं करता है तो वह सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य हो जाता है.
  • किसी सदन का एक निर्दलीय प्रत्याशी यदि चुनाव के पश्चात किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाता है तो वह अयोग्य हो जाता है.
  • एक नामित सदस्य यदि 6 माह के पश्चात किसी दल में सम्मिलित हो जाता है तो वह आयोग हो जाता है.
  • किसी व्यक्ति को तब अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता, जब वह अपने दल के दो तिहाई सदस्यों के किसी अन्य दल के साथ विलय के परिणाम स्वरुप किसी नए राजनीतिक दल में सम्मिलित होता है या उसके एक पृथक दल के रूप में कार्य करने लगता है.
  • किसी सदस्य को अयोग्य घोषित करने का निर्णय अधिकार सदन के अध्यक्ष सभापति को ही होता है.
  • यदि सभापति अध्यक्ष द्वारा दल-बदल किए जाने से संबंधित शिकायत सदन को प्राप्त होती है तो उसी सदन द्वारा निर्वाचित कोई सदस्य उस पर निर्णय लेता है.
  • जब यह कानून पारित हुआ था तो ऐसे आरोप लगे थे कि इसमें विधायकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर अतिक्रमण होता है क्योंकि
  • यह दलबदल और असहमति में भेद नहीं करता है.
  • यह प्रत्येक विषय पर सदस्यों के दृष्टिकोण और मतदान को नियंत्रित करता है.
  • मौलिक कर्तव्य का महत्व तथा इनकी सीमाएं
    संविधान में मौलिक कर्तव्यों को 42वें संशोधन के द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था. इनका उद्देश्य, भारत के प्रत्येक नागरिकों के लिए कर्तव्यों का एक समुच्चय प्रस्तुत करना था.
    दशकों से इनकी निरंतरता से इनके महत्व और प्रासंगिकता का पता चलता है. यह नागरिकों को इस तथ्य का स्मरण दिलाने का कार्य करते हैं उन्हें अपने अधिकारों का आनंद लेने के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का भी बोध होना चाहिए.
    मौलिक कर्तव्यों से विभिन्न वैधानिक उन्नतियों को आधार मिला है.
    नागरिकों के बीच इन्हें प्राकृतिक न्याय के रूप में प्रचारित किया जाता है.
    देश और समाज विरोधी गतिविधियों को मौलिक कर्तव्यों की छत्रछाया में रोका जाता है.
    परंतु फिर भी, कुछ ऐसे अनुरोध है जो इनकी सर्वसम्मत स्वीकृति में बाधक है. वह इस प्रकार है–
  • प्राथमिक रूप से यह न्यायिक कार्यवाही से परे है मौलिक अधिकारों की भांति इन पर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती.
  • ऐसा प्रतीत होता है कि, मौलिक कर्तव्यों की यथार्थ प्रकृति उनकी अस्पष्ट व्याख्या में कहीं खो गई है,इसीलिए इनका प्रभाव कम है.
  • इनके महत्व के बारे में जागरूकता उत्पन्न करने हेतु बहुत अधिक प्रयास नहीं किए गए हैं, इसी लिए नागरिकों के बीच इनके बारे में मौलिक अधिकारों जैसा बोध नहीं है.
  • संविधान के भाग IV के एक उपांग मात्र होने के कारण, मौलिक अधिकारों जैसा महत्व मौलिक कर्तव्यों का नहीं रहा है.
  • मौलिक कर्तव्यों के वास्तविक महत्व को कम कर देने वाले इन अवरोधों के बावजूद भी भारत जैसे विकासशील देश में नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों में सामंजस्य बनाने के लिए संयुक्त प्रयास की आवश्यकता है.
  • निर्वाचन-आयोग

    निर्वाचन आयोग क्या है?

    भारत निर्वाचन आयोग, जिसे चुनाव आयोग के नाम से भी जाना जाता है, एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय है जो भारत में संघ और राज्य चुनाव प्रक्रियाओं का संचालन करता है।
    यह देश में लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव का संचालन करता है।

    पृष्ठभूमि

    • भारतीय संविधान का भाग 15 चुनावों से संबंधित है जिसमें चुनावों के संचालन के लिये एक आयोग की स्थापना करने की बात कही गई है।
    • चुनाव आयोग की स्थापना 25 जनवरी, 1950 को संविधान के अनुसार की गई थी।
    • संविधान के अनुच्छेद 324 से 329 तक चुनाव आयोग और सदस्यों की शक्तियों, कार्य, कार्यकाल, पात्रता आदि से संबंधित हैं।

    संविधान में चुनावों से संबंधित अनुच्छेद

    324चुनाव आयोग में चुनावों के लिये निहित दायित्व: अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण।
    325धर्म, जाति या लिंग के आधार पर किसी भी व्यक्ति विशेष को मतदाता सूची में शामिल न करने और इनके आधार पर मतदान के लिये अयोग्य नहीं ठहराने का प्रावधान।
    326लोकसभा एवं प्रत्येक राज्य की विधानसभा के लिये निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा।
    327विधायिका द्वारा चुनाव के संबंध में संसद में कानून बनाने की शक्ति।
    328किसी राज्य के विधानमंडल को इसके चुनाव के लिये कानून बनाने की शक्ति।
    329चुनावी मामलों में अदालतों द्वारा हस्तक्षेप करने के लिये बार (BAR)

    निर्वाचन आयोग की संरचना

    • निर्वाचन आयोग में मूलतः केवल एक चुनाव आयुक्त का प्रावधान था, लेकिन राष्ट्रपति की एक अधिसूचना के ज़रिये 16 अक्तूबर, 1989 को इसे तीन सदस्यीय बना दिया गया।
    • इसके बाद कुछ समय के लिये इसे एक सदस्यीय आयोग बना दिया गया और 1 अक्तूबर, 1993 को इसका तीन सदस्यीय आयोग वाला स्वरूप फिर से बहाल कर दिया गया। तब से निर्वाचन आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं।
    • निर्वाचन आयोग का सचिवालय नई दिल्ली में स्थित है।
    • मुख्य निर्वाचन अधिकारी IAS रैंक का अधिकारी होता है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है तथा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति ही करता है।
    • इनका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु ( दोनों में से जो भी पहले हो) तक होता है।
    • इन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के समकक्ष दर्जा प्राप्त होता है और समान वेतन एवं भत्ते मिलते हैं।
    • मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान ही पद से हटाया जा सकता है।

    हटाने की प्रक्रिया

    • उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों, मुख्य चुनाव आयुक्त, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक को दुर्व्यवहार या पद के दुरुपयोग का आरोप सिद्ध होने पर या अक्षमता के आधार पर संसद द्वारा अपनाए गए प्रस्ताव के माध्यम से ही पद से हटाया जा सकता है।
    • निष्कासन के लिये दो-तिहाई सदस्यों के विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है और इसके लिये सदन के कुल सदस्यों का 50 प्रतिशत से अधिक मतदान होना चाहिये।
    • उपरोक्त पदों से किसी को हटाने के लिये संविधान में ‘महाभियोग’ शब्द का उपयोग नहीं किया गया है।
    • महाभियोग शब्द का प्रयोग केवल राष्ट्रपति को हटाने के लिये किया जाता है जिसके लिये संसद के दोनों सदनों में उपस्थित सदस्यों की कुल संख्या के दो-तिहाई सदस्यों के विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है और यह प्रक्रिया किसी अन्य मामले में नहीं अपनाई जाती।

    निर्वाचन आयोग के कार्य

    • चुनाव आयोग भारत में लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव की संपूर्ण प्रक्रिया का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करता है।
    • इसका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य आम चुनाव या उप-चुनाव कराने के लिये समय-समय पर चुनाव कार्यक्रम तय करना है।
    • यह निर्वाचक नामावली (Voter List) तैयार करता है तथा मतदाता पहचान पत्र (EPIC) जारी करता है।
    • यह मतदान एवं मतगणना केंद्रों के लिये स्थान, मतदाताओं के लिये मतदान केंद्र तय करना, मतदान एवं मतगणना केंद्रों में सभी प्रकार की आवश्यक व्यवस्थाएँ और अन्य संबद्ध कार्यों का प्रबंधन करता है।
    • यह राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करता है उनसे संबंधित विवादों को निपटाने के साथ ही उन्हें चुनाव चिह्न आवंटित करता है।
    • निर्वाचन के बाद अयोग्य ठहराए जाने के मामले में आयोग के पास संसद और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों की बैठक हेतु सलाहकार क्षेत्राधिकार भी है।
    • यह राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिये चुनाव में ‘आदर्श आचार संहिता’ जारी करता है, ताकि कोई अनुचित कार्य न करे या सत्ता में मौजूद लोगों द्वारा शक्तियों का दुरुपयोग न किया जाए।
    • यह सभी राजनीतिक दलों के लिये प्रति उम्मीदवार चुनाव अभियान खर्च की सीमा निर्धारित करता है और उसकी निगरानी भी करता है।

    भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) का महत्त्व

    • यह वर्ष 1952 से राष्ट्रीय और राज्य स्तर के चुनावों का सफलतापूर्वक संचालन कर रहा है। मतदान में लोगों की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये सक्रिय भूमिका निभाता है।
    • राजनीतिक दलों को अनुशासित करने का कार्य करता है।
    • संविधान में निहित मूल्यों को मानता है अर्थात चुनाव में समानता, निष्पक्षता, स्वतंत्रता स्थापित करता है।
    • विश्वसनीयता, निष्पक्षता, पारदर्शिता, अखंडता, जवाबदेही, स्वायत्तता और कुशलता के उच्चतम स्तर के साथ चुनाव आयोजित/संचालित करता है।
    • मतदाता-केंद्रित और मतदाता-अनुकूल वातावरण की चुनावी प्रक्रिया में सभी पात्र नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करता है।
    • चुनावी प्रक्रिया में राजनीतिक दलों और सभी हितधारकों के साथ संलग्न रहता है।
    • हितधारकों, मतदाताओं, राजनीतिक दलों, चुनाव अधिकारियों, उम्मीदवारों के बीच चुनावी प्रक्रिया और चुनावी शासन के बारे में जागरूकता पैदा करता है तथा देश की चुनाव प्रणाली के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ाने और उसे मज़बूती प्रदान करने का कार्य करता है।

    निर्वाचन आयोग के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

    • वर्षों से राजनीति में हिंसा और चुनावी दुर्भावनाओं के साथ कालेधन और आपराधिक तत्त्वों का बोलबाला बढ़ा है और इसके परिणामस्वरूप राजनीति का अपराधीकरण हुआ है। इनसे निपटना निर्वाचन आयोग के लिये एक बड़ी चुनौती है।
    • राज्यों की सरकारों द्वारा सत्ता का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया जाता है, जिसके तहत कई बार चुनावों से पहले बड़े पैमाने पर प्रमुख पदों पर तैनात योग्य अधिकारियों का स्थानांतरण कर दिया जाता है।
    • चुनाव के लिये सरकारी वाहनों और भवनों का उपयोग कर निर्वाचन आयोग की आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया जाता है।
    • निर्वाचन आयोग के पास राजनीतिक दलों को विनियमित करने के लिये पर्याप्त शक्तियाँ नहीं हैं।
    • किसी राजनीतिक दल के आंतरिक लोकतंत्र और पार्टी के वित्तीय विनियमन को सुनिश्चित करने की भी कोई शक्ति निर्वाचन आयोग के पास नहीं है।
    • हालिया वर्षों में निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं और यह धारणा ज़ोर पकड़ रही है कि चुनाव आयोग कार्यपालिका के दबाव में काम कर रहा है।
    • मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य दो आयुक्तों के चुनाव में प्रमुख संस्थागत कमियों में से एक है कम पारदर्शिता का होना, क्योंकि इनका चयन मौज़ूदा सरकार की पसंद पर आधारित होता है।
    • इसके अलावा EVM में खराबी, हैक होने और वोट दर्ज न होने जैसे आरोपों से भी निर्वाचन आयोग के प्रति आम जनता के विश्वास में कमी आती है।
    • वर्तमान समय में सत्ताधारी दल के पक्ष में निचले स्तर पर नौकरशाही की मिलीभगत के खिलाफ सतर्क रहने की आयोग के सामने बड़ी चुनौती है।
    • आयोग के जनादेश और जनादेश का समर्थन करने वाली प्रक्रियाओं को और अधिक कानूनी समर्थन प्रदान करने की आवश्यकता है।
    • नैतिकता सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक है कि सक्षम और योग्य व्यक्ति उच्च पदों का दायित्व संभालें।
    • निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिये द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष के नेता, कानून मंत्री और राज्यसभा के उपाध्यक्ष के साथ प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बना कॉलेजियम मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिये राष्ट्रपति के समक्ष नाम प्रस्तावित करे।
    (भारत के प्रथम चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन थे। वर्तमान में सुनील अरोड़ा मुख्य चुनाव आयुक्त हैं तथा अशोक लवासा और सुशील चंद्रा चुनाव आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं।)

    भारत-के-महान्यायवादी

    भारत के महान्यायवादी
    प्रस्तावना
      संविधान में अनुच्छेद 76 में भारत के महान्यायवादी के पद की व्यवस्था की गई है. यह देश का सर्वोच्च कानून अधिकारी होता है.
    नियुक्ति
      महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा सरकार की सिफारिश से होती है.
    न्यूनतम योग्यता
    महान्यायवादी की नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता है कि वह —
    • भारत का नागरिक हो
    • उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का 5 वर्ष का अनुभव हो या किसी उच्च न्यायालय में वकालत का 10 वर्षो का अनुभव हो.
    • राष्ट्रपति के अनुसार वह न्यायिक मामलों का योग्य व्यक्ति हो.
    • दूसरे शब्दों में महान्यायवादी बनने के लिए वही योग्यता होना आवश्यक है जो उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए होती है.
    कार्यकाल
      महान्यायवादी के कार्यकाल को संविधान द्वारा निश्चित नहीं किया गया है ना ही उसे हटाने को लेकर कोई मूल व्यवस्था दी गई है. वह अपने पद पर राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत तक बने रह सकता है.
    कार्य
    • भारत सरकार से संबंधित मामलों को लेकर उच्चतम न्यायालय में भारत सरकार की ओर से पेश होना.
    • संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत, राष्ट्रपति के द्वारा उच्चतम न्यायालय में भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करना.
    • भारत सरकार से संबंधित किसी मामले में उच्च न्यायालय में सुनवाई का अधिकार.
    • भारत सरकार को विधि संबंधी ऐसे विषयों पर सलाह देना जो राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गए हो.
    • विधिक स्वरुप में ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करना जो राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गए हो.
    • संविधान या किसी अन्य विधि द्वारा प्रदान किए गए कृत्यों का निर्वहन करना.
    अधिकार
    • महान्यायवादी को भारत के किसी भी क्षेत्र में किसी भी अदालत में सुनवाई का अधिकार है.
    • इसके अतिरिक्त संसद के दोनों सदनों में बोलने या कार्यवाही में भाग लेने या दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में मताधिकार के बगैर भाग लेने का अधिकार है.
    • महान्यायवादी को एक संसद सदस्य की तरह सभी भत्तों एवं विशेषाधिकार के लाभ प्राप्त होते हैं.
    सीमाएं
    • वह भारत सरकार के खिलाफ कोई सलाह या विश्लेषण नहीं कर सकता.
    • जिस मामले में उसे भारत सरकार की ओर से पेश होना है, उस पर वह कोई टिप्पणी नहीं कर सकता.
    • बिना भारत सरकार की अनुमति के वह किसी आपराधिक मामले में व्यक्ति का बचाव नहीं कर सकता.
    • बिना भारत सरकार की अनुमति के वह किसी परिषद या कंपनी के निदेशक का पद ग्रहण नहीं कर सकता.
    नोट – अनुच्छेद 88 में महान्यायवादी के संसद के सदनों तथा इसकी समितियों से जुड़े अधिकार के बारे में बताया गया है.
    अनुच्छेद 105 में महान्यायवादी की शक्तियां, विशेषाधिकार तथा प्रतिरक्षा के बारे में बताया गया है.

    rehabilitation-council-of-india-act

    भारतीय पुनर्वास परिषद् अधिनियम, 1992 और संशोधन अधिनियम, 2000
    • भारतीय पुनर्वास परिषद् अधिनियम पेशेवर पुनर्वास कर्मियों के प्रशिक्षण के नियमन और मान्यता प्राप्त पुनर्वास योग्यताएं रखने वाले पेशेवर पुनर्वास कर्मियों का नामांकन करने के लिए एवं केंद्रीय पुनर्वास पंजिका के संधारण के लिए भारतीय पुनर्वास परिषद के गठन की व्यवस्था करता है।
    • अधिनियम यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि नि:शक्त व्यक्तियों का उपचार योग्य कार्मिकों द्वारा किया जाये और यह प्रत्यायन (एक्रीडीशन) तथा गुणवत्ता नियंत्रण सुविधा के रूप में कार्य करता है।
    • यह अधिनियम परिषद के गठन, सदस्यता और कार्यों का विस्तार से प्रतिपादन करता है। इस अधिनियम की एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता है – पेशेवर पुनर्वास कर्मियों के लिए विश्वविद्यालय या अन्य संस्था द्वारा प्रदान की गई योग्यताओं को मान्यता देना।
    • इस अधिनियम में पाठयक्रमों और विश्वविद्यालयों संस्थाओं के नामों के साथ मान्यता प्राप्त पुनर्वास योग्यताओं की विस्तृत सूची दी गई है। इसके साथ ही यह अधिनियम सरकार में या किसी संस्था में पद-ग्रहण की दृष्टि से और देश के किसी भी भाग में पेशेवर पुनर्वास कर्मियों के रूप में कार्य करने के मान्यता-प्राप्त योग्यताओं वाले पेशेवर पुनर्वास कर्मियों के अधिकारों को निर्धारित करता है।
    • अधिनियम के अनुसार पुनर्वास परिषद के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं –
      • पुनर्वास योग्यता को मान्यता देने के लिए शिक्षा के न्यूनतम स्तर सुनिश्चित करना,
      • केंद्रीय पुनर्वास पंजिका में पेशेवर कर्मियों का पंजीकरण करना,
      • पेशेवर आचार संहिता के मानदंड निर्धारित करना और केंद्रीय पुनर्वास पंजिका से नामों को हटाना।
  • भारतीय पुनर्वास परिषद (संशोधन) अधिनियम, 2000 को पिछले अधिनियम में सुधार करने और उसके कार्यान्वयन कार्यतंत्र में सुधार हेतु लाया गया था।
  • इस अधिनियम में शामिल महत्वपूर्ण संशोधनों में पेशेवर पुनर्वास कर्मियों के अनुश्रवण और प्रशिक्षण के तथा पुनर्वास और विशेष शिक्षा में शोध के घटक निगरानी के द्वारा, इस परिषद के कार्य के दायरे का विस्तार करना शामिल है।
  • इसके अलावा इसमें नि:शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 में दी गई नि:शक्तता की परिभाषा को अपनाया गया है और यह उल्लेख किया गया है कि परिषद् का अध्यक्ष नि:शक्तता के क्षेत्र में अनुभव रखने वाला पेशेवर योग्यता वाला व्यक्ति होना चाहिए।
  • constituents-assembly

    प्रस्तावना
      दोस्तों UPPSC प्रीलिम्स परीक्षा को ध्यान में रखते हुए हमने संविधान सभा टॉपिक पर लगभग 1 घंटे की रिकॉर्डिंग की है, जिसे तीन छोटे छोटे हिस्से में विभाजित करके यूट्यूब पर डाला गया है.आप सभी अभ्यर्थी परीक्षा से पूर्व इस वीडियो को एक बार अवश्य सुने और परीक्षा में होने वाली छोटी छोटी गलतियों से बचे.

    preamble-of-the-constitution

    संविधान की प्रस्तावना
    1.संविधान की प्रस्तावना की विषय वस्तु
    2.प्रस्तावना के तत्व
    • संविधान के अधिकार का स्रोत
    • भारत की प्रकृति
    • संविधान का उद्देश्य
    • संविधान लागु होने की तिथि
    3.प्रस्तावना में मुख्य शब्द
    • सम्प्रभुता
    • समाजवादी
    • पंथनिरपेक्ष
    • लोकतांत्रिक
    • गणतंत्र
    • न्याय
    • स्वतंत्रता
    • समता
    • बंधुत्व
    4.प्रस्तावना का महत्व
    5.संविधान के एक भाग के रूप में प्रस्तावना का महत्व
    6.प्रस्तावना में संसोधन की संभावना
    प्रस्‍तावना या उद्देशिका किसी संविधान के दर्शन को सार रूप मे प्रस्‍तुत करने वाली संक्षिप्‍त अभिव्‍यक्ति होती है। सर्वप्रथम अमेरिकी संविधान निर्माताओं ने अपने संविधान में प्रस्‍तावना को शामिल किया गया था। इसके बाद जैसे-जैसे विभिन्‍न देशों ने अपने संविधान का निर्माण किया, उनमें से कई देशों ने प्रस्‍तावना को महत्‍वपूर्ण समझकर अपने संविधान का हिस्‍सा बनाया। भारतीय संविधान सभा ने 22 जनवरी, 1947 को नेहरू के उद्देश्‍य प्रस्‍ताव को स्‍वीकार किया। इसी उद्देश्‍य प्रस्‍ताव का विकसित रूप हमारे संविधान की प्रस्‍तावना ( उद्देश्‍यका ) है। उद्देश्‍य प्रस्‍ताव और प्रस्‍तावना मिलकर संविधान के दर्शन को मूर्त रूप प्रदान करते हैं।
    केशवानंद भारती बनाम केरल राज्‍य के मामले में उच्‍चतम न्‍यायालय ने स्‍पष्‍ट किया है कि प्रस्‍तावना संविधान के अंग है क्‍योंकि जब अन्‍य सभी उपबन्‍ध अधिनियमित किये जा चुके थे , उसके पश्‍चात् प्रस्‍तावना को अलग से पारित किया गया। संविधान के अन्‍य भागों की तरह प्रस्‍तावना में भी संशोधन संभव है, बशर्ते वह आधारभूत ढॉचे को क्षति न पहॅूचाता हो।

    प्रस्‍तावना की विषय वस्‍तु  (Content of the Preamble)

    1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्‍यम से प्रस्‍तावना में तीन शब्‍द- समाजबादी (Spcialist) , पंथ – निरपेक्ष (Secular) तथा अखण्‍डता (Integrity) जोड़े गए थे। इन शब्‍दों के जुड़ने के बाद प्रस्‍तावना का वर्तमान रूप इस प्रकार है –

    प्रस्‍तावना (उद्देशिका)

    हम भारत के लोग, भारत को एक सम्‍पूर्ण प्रभुत्‍व-सम्‍पन्‍न समाजबादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्‍मक गणराज्‍य बनाने के लिये तथा उसके समस्‍त नागरिकों को:
    सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्‍याय,
    विचार, अभिव्‍यक्ति, विश्‍वास, धर्म और उपासना की स्‍वतंत्रता,
    प्रतिष्‍ठा और अवसर की समता
    प्राप्‍त करने के लिए,
    तथा उन सब में व्‍यक्ति की गरिमा, राष्‍ट्र की एकता और अखण्‍ता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए
    दृढ़संकल्‍प होकर अपनी इस संविधानसभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. ( मिति  मार्गशीर्ष शुक्‍ल सप्‍तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी ) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्‍मार्पित करते हैं।

    प्रस्‍तावना की उपयोगिता  ( Utility of the Preamble )

    भारतीय संविधान की प्रस्‍तावना को संविधान की आत्‍मा कहा गया है। संविधान की प्रस्‍तावना संविधान की व्‍याख्‍या का आधार प्रस्‍तुत करती है। यह संविधान का दर्पण है जिसमें पूरे संविधान की तस्‍वीर दिखाई पड़ती है ! इसकी उपयोगिता है कि यह संविधान के स्‍त्रोत, राजव्‍यवस्‍था की प्रकृति एवं संविधान के उदेृश्‍यों से परिचय कराती है। इसके साथ ही संविधान के अर्थ निर्धारण में एवं ऐतिहासिक स्‍त्रोत के रूप में भी प्रस्‍तावना उपयोगी है।
    संविधान का स्‍त्रोत (Sources of constitution)
    संविधान की प्रस्‍तावना में प्रयुक्‍त वाक्‍यंश ‘हम भारत के लोग’ प्रमाणित करता है कि भारतीय संविधान का स्‍त्रोत भारतीय जनता है। यह भारतीय राज्‍यव्‍यवस्‍था के लो‍कतांत्रिक पक्ष को भी प्रस्‍तुत करता हैं।
    राजव्‍यवस्‍था की प्रकृति का परिचय (Introduction of the nature of polity)
    भारतीय राजव्यवस्था की प्रक्रति को स्पष्ट करने के लिये प्रस्ताबना में पांच शब्द बिशेष महत्व के हैं –
    1.संपूर्ण प्रभुत्‍व संपन्‍न – इसका अर्थ है कि आंतरिक और वाह्म मामलों में निर्णय लेने लेने के लिए भारत संपूर्ण शक्ति रखता है और किसी भी विदेशी शक्ति को इसमें हस्‍तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है , जहॉं तक राष्‍ट्रकुल का प्रश्‍न है तो भारत उसे ‘स्‍वाधीन राष्‍ट्रों एक संगठन’ के रूप देखता है, न कि ब्रिटिश साम्राज्‍य के विस्‍तार के रूप में। भारत, व्रिटिश सम्राज को राष्‍ट्रकुल के अध्‍यक्ष के रूप में सिर्फ प्रतीकात्‍मक तौर पर स्‍वीकार करता है।
    2.समाजवादी- यह शब्‍द प्रस्‍तावना में 42 वें संशोधन 1976 द्वारा जोड़ा गया। भारत आर्थिक न्‍याय की धारणा को लोकतंत्र के साथ मिलाकर चलता है, इस दृष्टि से इसे लोकतांत्रिक समाजवाद कहा जा सकता है। सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने ‘’डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ (1982) मामले’’ में स्‍पष्‍ट किया कि भारतीय समाजवाद, गांधीवाद और मार्क्‍सवाद का अनोखा मिश्रण है जो निश्चित रूप से गांधीवाद की ओर झुका हुआ है। भारतीय समाजवाद अर्थव्‍यवस्‍था के स्‍तर पर निजी उद्यमशीलता और सरकारी नियंत्रण दोनों के साथ-साथ रखा है।
    1991 में लागू हुई उदारीकरण, निजीकरण तथा भूमंडलीकरण की नीति के बाद भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था विश्‍व-अर्थव्‍यवस्‍था के साथ काफी हद तक जुड़ चुकी है। अत: समाजवादी दलों और चिंतको का आरोप है कि भारत समाजवादी नहीं रहा है और नव-उदारवादी हो गया है।
    3.पंथनिरपेक्ष- पंथनिरपेक्ष राज्‍य की सबसे प्रमुख पहचान यह है कि यह न तो किसी धर्म विशेष को राजकीय धर्म का दर्जा देता है और न ही अपने नागरिकों को धार्मिक स्‍वतंत्रता से वंचित करता है। भारत के संविधान में यह शब्‍द 42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया परन्‍तु वास्‍तव में भारत आजादी के समय से ही पंथनिरपेक्ष राज्‍य रहा है। अनु. (25से 28) में धार्मिक स्‍वतंत्रता के अधिकार का अत्‍यंत व्‍यापक रूप से उल्‍लेख किया है। माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय ने पंथनिरपेक्षता को संविधान का आधारभूत लक्षण माना है। संविधान में धर्मं के आधार पर विभेद का प्रति‍षेध किया गया है !
    4.लोकतांत्रिक- इसका अर्थ है कि भारतीय राजव्‍यवस्‍था शासन के जिस रूप को स्‍वीकार करती है वह लोकतंत्र है, न कि राज्‍यतंत्र, अधिनायकतंत्र या कुछ और। स्‍पष्‍टत: भारत का शासन यहॉं के नागरिकों द्वारा चलाया जाता है। जनसंख्‍या अधिक होने के कारण भारत में अप्रत्‍यक्ष लोकतंत्र को अपनाया गया तथा इसके क्षेत्रीय, भाषायी, धार्मिक, सांस्‍कृतिक, नस्‍लीय विविधता को देखते हुए बहुदलीय लोकतंत्र को स्‍वीकार किया गया है। विचारधारा की दृष्टि से भारतीय लोकतंत्र उदारवादी है और आर्थिक न्‍याय के कारण समाजवादी लोकतंत्र के काफी नजदीक पहॅूच जाता है।
    5.गणराज्‍य- इसका अर्थ है कि राज्‍यध्‍यक्ष निर्वाचित होगा न कि वह ब्रिटेन के सम्राट की तरह आनुवंशिक शासन होगा। भारत का राज्‍याध्‍यक्ष ‘राष्‍टपति’ होता है और उसके अप्रत्‍यक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित किया जाता है। इस प्रकार भारत का कोई भी नागरिक यदि अर्हत है तो किसी भी पद पर नियुक्‍त हो सकता है यहॉ तक कि वह ‘राज्‍यध्‍यक्ष’ पद पर भी आसीन हो सकता है।
    संविधान के उद्देश्‍यों का परिचय (Introduction of Constitution)
    1.प्रथम उद्देश्‍य है- नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्‍याय उपलब्‍ध कराना – यहॉं न्‍याय कानूनी न्‍याय न होकर वितरणमूलक न्‍याय है जो न्‍याय का व्‍यापक रूप होता है। सामाजिक न्‍याय  के अन्‍तर्गत समाज के मुख्‍य धारा से वंचित लोगो को आरक्षण व अन्‍य प्रकार की सुविधाऍ दी गई हैं। राजनीतिक न्‍याय के अन्‍तर्गत राजनीतिक प्रक्रिया मे सभी नागरिक भाग ले सकते हैं। सार्वभौमिक वयस्‍क मताधिकार के साथ-साथ वंचित वर्गों के लिये राजनीतिक आरक्षण का आधार यही है। आर्थिक न्‍याय का अर्थ है कि समाज की कुल संपदा किसी छोटे से वर्ग तक सीमित न रह जाए अपितु विभिन्‍न वर्गों में आय और जीवन के स्‍तर में अंतराल कम से कम हो। ‘मनरेगा’ जैसे कार्यक्रम आर्थिक न्‍याय के आदर्श को ही साधने का प्रयत्‍न है।
    2.दूसरा उद्देश्‍य है- विचार, अभिव्‍यक्ति, विश्‍वास, धर्म और उपासना की स्‍वतंत्रता प्रदान करना- अन्‍य व्‍यक्तित्‍व की स्वतंत्रता को देखते हुए असीमित स्‍वतंत्रता प्रदान नहीं की जा सकती। स्‍वतंत्रता का यह आदर्श मूलत: फ़्रास की क्रान्ति से लिया गया है और इस पर कुछ वेचारिक प्रभाव अमेरिकी संविधान का भी है। इसके अंतर्गत प्रत्‍येक व्‍यक्ति को उतना अधिकतम स्‍वतंत्रता दी जाती है, जितनी स्‍वतंत्रता बाकी व्यक्तियों को भी दी जा सके। स्‍पष्‍ट है कि स्‍वतंत्रता असीमित नहीं हैं। अनुच्‍छेद 19 में दी गई स्‍वतंत्रताओं पर युक्तियुक्‍त निर्बंधन लगाए गए हैं। साथ ही अनु. 25 से 28 तक धर्म और अंत:करण की व्‍यापक स्‍वतंत्रता प्रदान की गई है।
    3.तीसरा उद्देश्‍य है- प्रत्‍यके व्‍यक्ति को प्रतिष्‍ठा एवं अवसर की समानता उपलब्‍ध कराना- भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 14 से 18 तक विभिन्‍न प्रकार की समानताऍ उपलब्‍ध कराई गई हैं और असमानताओं का निषेध किया गया है जैसे-अस्‍पृश्‍यता का अंत। साथ ही साथ राज्‍य के नीति-निदेशक तत्‍वों के अन्‍तर्गत महिला और पुरूष के लिये समान अधिकार आदि प्रावधान समानता के आदर्श को उपलब्‍ध कराने में महत्‍वपूर्ण हैं।
    4.चौथा उद्देश्‍य है- बंधुत्‍व की भावना का विकास करना-बंधुता का आदर्श फ्रॉस की क्रातिं का मुख्‍य आधार था और वहीं से यह सम्‍पूर्ण विश्‍व में फैला। प्रस्‍तावना में ‘व्‍यक्ति की गरिमा और राष्‍ट्र की एकता और अखण्‍डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता’ को बढ़ाने पर बल दिया गया है। बंधुता का दूसरा अर्थ जो एकता या बंधुता राष्‍ट्र विरोधी भावनाओं पर आधारित हो, भारत के नागरिकों को उससे बचना चाहिये। बंधुता वास्‍तव में वही है जो राष्‍ट्र की एकता को अक्षुण्‍ण बनाए रखे। अनुच्‍छेद 51क. में नागरिकों का यह मूल कर्तव्‍य बताया गया है कि वे ‘भारत के लोगों में समरसता और समान भातृत्‍व की भावना का निर्माण करें जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदों से परे हो’।
    संविधान के अर्थ निर्धारण के लिये उपयोगी (Useful for the interpretation of the Constitution)
    प्रस्ताबना संविधान के विधिक निर्वचन में सहायक है। किसी भी अधिनियम का अर्थ स्‍पष्‍ट करने के लिए यह संविधान की कुंजी के रूप में कार्य करती है। उच्‍चतम न्‍यायालय ने इस संबंध में निम्‍न निर्णय दिये हैं-
    1. प्रस्‍तावना किसी विनिर्दिष्‍ट उपबंध की शक्ति का स्‍त्रोत हो सकता है।
    2. विधायिका की शक्तियों पर सीमा अधिरोपित करने के लिये प्रस्‍तावना को स्‍त्रोत नहीं बनाया जा सकता।
    3. यदि किसी अनुच्छेद या प्रावधान के शब्‍दों के दो अर्थ हों या अर्थ संदिग्‍ध या अस्‍पष्‍ट हो तो उस दशा में सही अर्थ तक पहॅूचने के लिये प्रस्ताबना की सहायता ली जा सकती है।
    ऐतिहासिक स्‍त्रोत के रूप में (As a historical Source)
    उद्देशिका बताती है कि भारत का संविधान 26 नबंबर, 1949 को अधिनियमित और अंगीकृत हुआ !( ध्‍यातव्‍य है कि संपूर्ण भारतीय संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ)।

    परीक्षोपयोगी अन्य महत्‍वपूर्ण तथ्‍य


    • प्रस्‍तावना भारतीय संविधान के दर्शन को मूर्त रूप प्रदान करती है।
    • ‘केशवानन्‍द भारतीय बनाम केरल राज्‍य’ मामले में सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने प्रस्‍तावना को संवधान का अंग और संशोधनीय माना।
    • प्रस्‍तावना संविधान निर्माताओं के विचारों को जानने की कुंजी है।
    • प्रस्‍तावना में उन उद्देश्‍यों का कथन है जिन्‍हें हमारा संविधान स्‍थापित करना चाहता है और आगे बढ़ाना चाहता है।
    • 42वें संशोधन 1976 द्वारा प्रस्‍तावना में तीन शब्‍द ‘समाजवादी’, ’पथ निरपेक्ष’, और ‘अखण्‍डता’ जोड़े गए।
    • भारतीय संविधान को 26 नवंबर, 1949 में अंगीकृत, अधिनियमित और सात्‍मार्पित किया गया।
    • प्रस्‍तावना के निम्‍नलिखित शब्‍द संविधान के आधारभूत ढॉचे का हिस्‍सा हैं- सम्‍पूर्ण प्रभुतवसम्‍पन्‍न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्‍य, राष्‍ट्र की एकता ओर अखण्‍डता।
    • प्रस्‍तावना स्‍पष्‍ट करती है कि भारत के शासन की सर्वोच्‍च सत्‍ता भारत की जनता में निहित है।
    Preamble of the Constitution (संविधान की प्रस्तावना) Part 2

    emergency-provisions

    संवैधानिक प्रावधान
    भारतीय संविधान मेँ तीन प्रकार के आपातकाल की व्यवस्था की गई है,
  • राष्ट्रीय आपात – अनुच्छेद 352
  • राष्ट्रपति शासन – अनुच्छेद 356
  • वित्तीय आपात – अनुच्छेद 360
    • राष्ट्रीय आपात, अनुच्छेद 352 – इसकी घोषणा युद्ध वाह्य आक्रमण और सशस्त्र विद्रोह मेँ से किसी भी आधार पर राष्ट्रपति के द्वारा की जा सकती है।
    • राष्ट्रपति आपात की घोषणा राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश पर करता है।
    • राष्ट्रपति आपात की उदघोषणा को न्यायालय में प्रश्नगत किया जा सकता है।
    • 44 वेँ संशोधन द्वारा अनुच्छेद 352 के अधीन उद्घोषणा संपूर्ण भारत मेँ या उसके किसी भाग मेँ की जा सकती है।
    • राष्ट्रीय आपात के समय राज्य सरकार निलंबित नहीँ की जाती है, अपितु वह संघ की कार्यपालिका के पूर्ण नियंत्रण मेँ आ जाती है।
    • राष्ट्रपति द्वारा की गई आपकी खोज एक माह तक प्रवर्तन मेँ रहती है और यदि इस दौरान इसे संसद के दो तिहाई बहुमत से अनुमोदित करवा लिया जाता है, तो वह 6 माह तक प्रवर्तन मेँ रहती है और यदि इसे संसद के दो तिहाई बहुमत से अनुमोदित करवा लिया जाता है, तो वह 6 माह तक प्रवर्तन में रहती है। संसद इसे पुनः एक बार में 6 महीने तक बाधा सकती है।
    • यदि लोकसभा साधारण बहुमत से आपात उद्घोषणा को वापस लेने का प्रस्ताव पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति को उद्घोषणा को वापस लेनी पड़ती है।
    • आपात उद्घोषणा पर विचार करने के लिए लोकसभा का विशेष अधिवेशन जब आहूत किया जा सकता है, जब लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 1/10 सदस्योँ द्वारा लिखित सूचना लोकसभा अध्यक्ष को, जब सत्र चल रहा हो या राष्ट्रपति को, जब तक नहीँ चल रहा हो, दी जाती है।
    • यदि राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है (यदि राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट हो जाता है) कि युद्ध, वाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के कारण देश की सुरक्षा संकट मेँ है तो वह संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग मेँ राष्ट्रीय आपात उद्घोषित कर सकता है।
    • युद्ध या वाह्य आक्रमण के आधार पर लगाए गए आपात को वाह्य आपात के नाम से तथा स्वास्थ्य विद्रोह के आधार पर लगाए गए आपात को आंतरिक आपात के नाम से जाना जाता है।
    • संघ के मंत्रिमंडल की लिखित सलाह के बाद ही राष्ट्रपति द्वारा आपात की उद्घोषणा की जा सकती है।
    • एक माह के अंदर संसद के दोनो सदनोँ द्वारा विशेष बहुमत द्वारा आपात की उद्घोषणा का अनुमोदन होना चाहिए (उपस्थित मत देने वाले सदस्योँ का कम से कम दो तिहाई और कुल सदस्य संख्या का बहुमत)।
    • यह आपात उद्घोषणा दूसरे सदन द्वारा संकल्प पारित किए जाने की तारीख 6 मास की अवधि तक प्रवर्तन मेँ रहैगी, परंतु इसको असंख्य बार विस्तारित किया जा सकता है, प्रत्येक प्रत्येक बार केवल 6 मास की अवधि के लिए।
    • आपात, राष्ट्रपति द्वारा किसी समय हटाया जा सकता है। लोकसभा, आपात को समाप्त करने के लिए साधारण बहुमत द्वारा संकल्प पारित कर आपात को हटा सकती है।
    • लोकसभा अध्यक्ष या राष्टपति सूचना प्राप्ति के 14 दिनोँ के अंदर लोकसभा का विशेष अधिवेशन आहूत करते हैं।
    राष्ट्रीय आपात का दुरुपयोग रोकने के लिए संविधान मेँ उपबंध
    • इन उपबंधोँ मेँ अधिकांशतः 44 वेँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा अनुच्छेद 352 मेँ संशोधन कर लाए गए हैं।
    • पहले राष्ट्रीय आपात, युद्ध या वाह्य आक्रमण या आंतरिक अशांति के आधार पर लगाया जा सकता था। 44वेँ संविधान संशोधन अधिनियम ने आंतरिक अशांति की जगह सशस्त्र विद्रोह का प्रावधान कर दिया है।
    • राष्ट्रपति द्वारा आपात की उद्घोषणा करने के लिए संघ मंत्रिमंडल की लिखित राय जरुरी है।
    • संसद द्वारा एक अनुमोदन के बाद क्या केवल 6 माह तक प्रवर्तन मेँ रह सकता है लोक सभा द्वारा साधारण बहुमत से पारित एक संकल्प द्वारा इसे समाप्त किया जा सकता है।
    • एक माह के अंदर संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत द्वारा इसका अनुमोदन जरुरी है (पहले यह दो माह और साधारण बहुमत था।
    • पहले सभी प्रकार के आपात मेँ अनुच्छेद 19 स्वतः मेँ निलंबित हो जाता था। लेकिन अब केवल वाह्य आपात की दशा मेँ ही अनुछेद 19 स्वतः निलंबित होता है।
    • अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 12 वाह्य आपातकाल मेँ भी निलंबित नहीँ हो सकता है।
    राष्ट्रीय आपात का प्रभाव
    • कार्यपालिका का प्रभाव – केंद्र किसी विषय पर राज्योँ को निर्देश दे सकता है। परन्तु राज्य सरकार बर्खास्त या निलंबित नहीँ की जाती है।
    • विधायी प्रभाव – संसद को राज्य सूची के विषय पर समवर्ती शक्ति मिल जाती है। अर्थात राज्य सूची के किसी विषय पर संसद विधान बना सकती है। राज्य विधानसभा बर्खास्त या निलंबित नहीँ की जाती है और यह अस्तित्व मेँ रहती है तथा राज्य विषयों पर प्रावधान बनाना जारी रखती है।
    • संसद विधि द्वारा लोक सभा तथा राज्य विधानसभा की अवधि सामान्य पांच वर्ष की अवधि से एक बार मेँ एक वर्ष से अधिक के लिए बढ़ा सकती है।
    • वित्तीय संबंधो पर प्रभाव – केंद्र, राज्योँ के साथ वित्तीय संसाधनोँ के वितरण को निलंबित कर सकता है।
    मूल अधिकारोँ पर प्रभाव
    • अनुछेद 20 और अनुच्छेद 21 कभी निलंबित नहीँ होते हैं।
    • अनुच्छेद 19 वाह्य आपात की दशा मेँ स्वतः निलंबित हो जाता है और आंतरिक आपात की दशा मेँ एक पृथक उद्घोषणा द्वारा निलंबित किया जा सकता है।
    • अन्य सभी मूल अधिकार, राष्ट्रपति की पृथक, उद्घोषणा द्वारा निलंबित किए जा सकते हैं।
    आपातकाल की उद्घोषणा के प्रभाव
    जब कभी संविधान के अनुछेद 352 के अंतर्गत आपातकाल उद्घोषणा होती है, तो उसके ये प्रभाव होते हैं
    • राज्य की कार्यपालिका शक्ति संघीय कार्यपालिका शक्ति के अधीन हो जाती है।
    • संसद की विधायी शक्ति राज्य सूची से संबद्ध विषयों तक विस्तृत हो जाती है।
    • संविधान के अनुच्छेद 19 मेँ दी गई स्वतंत्रताएं स्थगित हो जाती हैं।
    • राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त हो जाता है, किस संविधान के अनुच्छेद 20-21 मेँ उल्लिखित अधिकारोँ के क्रियान्वयन के लिए न्यायपालिका की शरण लेने के अधिकार को स्थगित कर दें।
    • अनुच्छेद 352 के अधीन वाह्य आक्रमण के आधार पर प्रथम आपात की घोषणा चीनी आक्रमण के समय 26 अक्टूबर, 1962 ईं को की गई थी। यह उद्घोषणा 10 जनवरी 1968 को वापस ले ली गयी।
    • दूसरी बार आपात की उदघोषणा 3 दिसंबर, 1971 ईं को पाकिस्तान से युद्ध के समय की गई (वाह्य आक्रमण के आधार पर)।
    राज्य मेँ राष्ट्रपति शासन
    • अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति किसी राज्य मेँ यह समाधान हो जाने पर कि राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है अथवा राज्य संघ की कार्यपालिका के किन्हीं निर्देशों का अनुपालन करने मेँ असमर्थ रहता है, तो आपात स्थिति की घोषणा कर सकता है।
    • राज्य मेँ आपात की घोषणा के बाद संघ न्यायिक कार्य छोडकर राज्य प्रशासन के कार्य अपने हाथ मेँ ले लेता है।
    • राज्य में आपात की उद्घोषणा की अवधि 2 मास होती है। इससे अधिक के लिए संसद से अनुमति लेनी होती है, तब यह 6 माह की होती है। अधिकतम 3 वर्ष तक यह एक राज्य के परिवर्तन में रह सकती है। इससे अधिक के लिए संविधान मेँ संशोधन करना पडता है।
    • सर्वप्रथम पंजाब राज्य मेँ अनुच्छेद 356 का प्रयोग किया गया (जो 1951 में भार्गव मंत्रिमंडल के पतन का कारण बना)।
    • सर्वाधिक समय तक अनुच्छेद 356 का प्रयोग पंजाब राज्य मेँ ही रहा – 11 मई, 1987 से 25 फरवरी, 1992 तक।
    • अनुच्छेद 356 का जनवरी 2002 ईं तक 115 बार प्रयोग किया गया है।
    राज्य मेँ आपात स्थिति – अनुच्छेद 356
    • राज्यपाल के प्रतिवेदन पर या अन्यथा, यदि राष्ट्रपति संतुष्ट हो जाता है, कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमेँ राज्य की सरकार संविधान के उपबंधोँ के अनुसार नहीँ चल सकती है, तो वह राज्य सरकार के सभी कृत्य अपने हाथ मेँ ले सकता है और यह घोषित कर सकता है कि राज्य विधान मंडल की शक्तियोँ का प्रयोग संसद द्वारा किया जाएगा।
    • ऐसी उद्घोषणा, 2 माह के अंदर संसद के दोनो सदनों द्वारा साधारण बहुमत द्वारा पारित होनी चाहिए। अनुमोदन के बाद यह, यह उद्घोषणा की तारीख से 6 मास की अवधि के लिए प्रवर्तन मेँ रहता है।
    • संसद द्वारा अनुमोदन के बाद यह 6 मास की अवधि के लिए और विस्तारित किया जा सकता है।
    • राष्ट्रपति शासन को एक वर्ष की इस समय अवधि के बाद अधिकतम 2 और वर्षो के लिए विस्तारित किया जा सकता है (परंतु एक बार मेँ केवल 6 माह के लिए), बशर्ते निम्नलिखित 2 शर्तें पूरी हो रही हों –
    • 1. संपूर्ण भारत मेँ या संपूर्ण राज्य मेँ या राज्य के किसी भाग मेँ आपात स्थिति लागू है।
      2. निर्वाचन आयोग यह प्रमाणित कर देता है कि राज्य विधानसभा के साधारण निर्वाचन कराने मेँ कठिनाई के कारण राष्ट्रपति शासन जारी रखना आवश्यक है।
    राष्ट्रपति शासन का प्रभाव
    • कार्यपालिका पर – राज्य मंत्रिपरिषद बर्खास्त कर दी जाती है और इसके सभी कृत्यों का निर्वहन राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के निर्देश पर किया जाता है।
    • विधायिका पर – राज्य की विधानसभा बर्खास्त या निलंबित कर दी जाती है और संसद को राज्य विषय पर विधायी अधिकारिता प्राप्त हो जाती है।
    राष्ट्रीय आपात और राष्ट्रपति शासन मेँ अंतर
    • राष्ट्रीय आपात मेँ केंद्र और सभी राज्योँ के मध्य संबंधों (केवल वही राज्य नहीँ जहां आपात स्थिति लागू है।) मेँ मूलभूत परिवर्तन आता है, जबकि राष्ट्रपति शासन मेँ केंद्र तथा केवल संबंधित राज्य के मध्य संबंध मेँ परिवर्तन आता है।
    • राष्ट्रीय आपात मेँ राज्य मंत्री परिषद अस्तित्व मेँ रहती है और अपने कर्तव्योँ का निर्वहन जारी रखती है, जबकि राष्ट्रपति शासन मेँ राज्य मंत्री परिषद बर्खास्त कर दी जाती है।
    • राष्ट्रीय आपात मेँ राज्य विधान सभा कार्य करना जारी रखती है, जबकि ,राष्ट्रपति शासन मेँ यह बर्खास्त या निलंबित कर दी जाती है।
    • राष्ट्रीय आपात मेँ मूल अधिकार प्रभावित होते हैँ, राष्ट्रपति शासन मेँ ऐसा कोई प्रभाव नहीँ पड़ता है।
    • राष्ट्रीय आपात मेँ केंद्र और राज्योँ के मध्य वित्तीय संबंध प्रभावित हो सकते हैं, किंतु राष्ट्रपति शासन मेँ नहीँ।
    वित्तीय आपात
    • अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपात की उदघोषणा राष्ट्रपति द्वारा तब की जाती है, जब उसे विश्वास हो जाए की ऐसी स्थिति विद्यमान है, जिसके कारण भारत के वित्तीय स्थायित्व या साख को खतरा है।
    • वित्तीय आपात की घोषणा दो महीनों के भीतर संसद के दोनो सदनो के सम्मुख रखना तथा उनकी स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है।
    • यदि वित्तीय आपात की घोषणा उस समय की जाती है, जब लोकसभा विघटित हो, तो दो महीने के भीतर राज्य सभा की स्वीकृति मिलने के उपरांत वह आगे भी लागू रहेगी।
    • किंतु नवनिर्वाचित लोक सभा द्वारा की प्रथम बैठक के आरंभ से 30 दिन के भीतर ऐसी घोषणा की स्वीकृति आवश्यक है।
    • राष्ट्रपति वित्तीय आपात की घोषणा को किसी भी समय वापस ले सकता है।
    • यदि राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट हो जाता है कि भारत या उसके राज्यक्षेत्र के किसी भाग का वितीय स्थायित्व संकट मेँ है तो वह देश मेँ वित्तीय आपात लागू कर सकता है।
    • उद्घोषणा के 2 माह के अंदर यह संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदित होना चाहिए और अनुमोदित होने के बाद यह तब तक जारी रहेगा जब तक राष्ट्रपति इसे वापस नहीँ लेता।
    वित्तीय आपात का निम्नलिखित प्रभाव होता है –
    • राज्योँ के राज्यपालोँ को यह निर्देश दिया जा सकता है कि वे राज्य के सभी धन एवं वित्त विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करेँ।
    • राज्योँ को वित्तीय अनुशासन कायम करने के लिए कहा जा सकता है।
    • केंद्र एवं राज्योँ के मध्य वित्तीय संशोधनों के विभाजन को निलंबित रखा जा सकता है।
    • सभी संवैधानिक अधिकारियोँ के वेतन एवं भत्ते कम किए जा सकते हैं।