क्र.सं.
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लोकसभा
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राज्यसभा
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1.
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इसके सदस्य आम जनता द्वारा वयस्क मतदान की प्रक्रिया के तहत चुने जाते हैं|
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इसके सदस्य राज्य विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं|
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2.
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लोक सभा का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है|
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यह एक स्थायी सदन है जिसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो साल बाद रिटायर हो जाते हैं|
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3.
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इसकी अधिकतम सदस्य संख्या 552 है|
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इसकी अधिकतम सदस्य संख्या 250 है|
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4.
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धन विधेयक को केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है। यह सदन देश में शासन चलाने हेतु धन आवंटित करता है|
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धन विधेयक के संबंध में राज्यसभा को अधिक शक्तियां प्राप्त नहीं है|
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5.
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केन्द्रीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है|
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केन्द्रीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्यसभा के प्रति उत्तरदायी नहीं होती है|
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6.
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लोकसभा के बैठकों की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करते हैं|
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राज्यसभा की बैठकों की अध्यक्षता उप-राष्ट्रपति करते हैं |
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7.
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इसे निचला सदन या आम जनता का सदन कहा जाता है|
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इसे ऊपरी सदन या ‘राज्यों की परिषद्’ कहा जाता है|
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8.
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यदि कैबिनेट मंत्री द्वारा प्रस्तुत कोई विधेयक इस सदन में पारित नहीं हो पाता है, तो पूरी कैबिनेट को इस्तीफा देना पड़ता है।
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यदि कैबिनेट मंत्री द्वारा प्रस्तुत कोई विधेयक इस सदन में पारित नहीं हो पाता है, तो पूरी कैबिनेट को इस्तीफा नहीं देना पड़ता है।
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9.
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भारत के राष्ट्रपति इस सदन में आंग्ल-भारतीय समुदाय के 2 सदस्यों को मनोनीत कर सकते हैं।
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भारत के राष्ट्रपति इस सदन में कला, शिक्षा, समाजसेवा एवं खेल जैसे क्षेत्रों से संबंधित 12 सदस्यों को मनोनीत कर सकते हैं|
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10.
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लोकसभा का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु-सीमा 25 वर्ष है|
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राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु-सीमा 30 वर्ष है|
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Monday, April 6, 2020
लोकसभा / राज्यसभा
CAG(नियंत्रक और महालेखापरीक्षक)
भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक
- भारत का नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (CAG-कैग) संभवतः भारत के संविधान का सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी है। वह ऐसा व्यक्ति है जो यह देखता है कि संसद द्वारा अनुमन्य खर्चों की सीमा से अधिक धन खर्च न होने पाए या संसद द्वारा विनियोग अधिनियम में निर्धारित मदों पर ही धन खर्च किया जाए।”
-डॉ. भीम राव अम्बेडकर
- भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (Comptroller & Auditor General of India-CAG) भारत के संविधान के तहत एक स्वतंत्र प्राधिकरण है।
- यह भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा विभाग (Indian Audit & Accounts Department) का प्रमुख और सार्वजनिक क्षेत्र का प्रमुख संरक्षक है।
- इस संस्था के माध्यम से संसद और राज्य विधानसभाओं के लिये सरकार और अन्य सार्वजनिक प्राधिकरणों (सार्वजनिक धन खर्च करने वाले) की जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है और यह जानकारी जनसाधारण को दी जाती है।
पृष्ठभूमि
- महालेखाकार का कार्यालय वर्ष 1858 में स्थापित किया गया था, ठीक उसी वर्ष जब अंग्रेज़ों ने ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत का प्रशासनिक नियंत्रण अपने हाथों में लिया था।
- वर्ष 1860 में सर एडवर्ड ड्रमंड को पहले ऑडिटर जनरल के रूप में नियुक्त किया गया। इसके कुछ समय बाद भारत के महालेखापरीक्षक को भारत सरकार का लेखा परीक्षक और महालेखाकार कहा जाने लगा।
- वर्ष 1866 में इस पद का नाम बदलकर नियंत्रक महालेखा परीक्षक कर दिया गया और वर्ष 1884 में इसे भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक के रूप में फिर से नामित किया गया।
- भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत महालेखापरीक्षक को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया क्योंकि इस पद को वैधानिक दर्जा दिया गया था।
- भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने संघीय ढाँचे में प्रांतीय लेखा परीक्षकों के लिये प्रावधान करके महालेखापरीक्षक के पद को और शक्ति दी।
- इस अधिनियम में नियुक्ति और सेवा प्रक्रियाओं का भी उल्लेख था और भारत के महालेखापरीक्षक के कर्त्तव्यों का संक्षिप्त विवरण भी।
- वर्ष 1936 के लेखा और लेखा परीक्षा आदेश ने महालेखापरीक्षक के उत्तरदायित्वों और लेखा परीक्षा कार्यों का प्रावधान किया।
- यह व्यवस्था वर्ष 1947 तक अपरिवर्तित रही। स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 148 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा एक नियंत्रक और महालेखापरीक्षक नियुक्त किये जाने का प्रावधान किया गया।
- वर्ष 1958 में CAG के क्षेत्राधिकार में जम्मू और कश्मीर को शामिल किया गया।
- वर्ष 1971 में केंद्र सरकार ने नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (कर्त्तव्य, शक्तियाँ और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971 लागू किया।
- अधिनियम ने CAG को केंद्र और राज्य सरकारों के लिये लेखांकन और लेखा परीक्षा दोनों की ज़िम्मेदारी दी।
- वर्ष 1976 में CAG को लेखांकन के कार्यों से मुक्त कर दिया गया।
ब्रिटेन के CAG से तुलना
- भारत का CAG केवल महालेखापरीक्षक की भूमिका निभाता है, नियंत्रक महालेखाकार की नहीं, जबकि ब्रिटेन में महालेखापरीक्षक के साथ-साथ इसमें नियंत्रक महालेखाकार की शक्ति भी निहित होती है।
- भारत में CAG पैसा खर्च होने के बाद खातों का लेखा-जोखा करता है यानी पोस्ट-फैक्टो, जबकि UK में CAG की मंज़ूरी के बिना सरकारी खजाने से कोई पैसा निकाला ही नहीं जा सकता है।
- भारत में CAG संसद का सदस्य नहीं होता, जबकि ब्रिटेन में कैग हाउस ऑफ कॉमंस का सदस्य होता है।
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 148 CAG की नियुक्ति, शपथ और सेवा की शर्तों से संबंधित है।
- अनुच्छेद 149 भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक के कर्त्तव्यों और शक्तियों से संबंधित है।
- अनुच्छेद 150 कहता है कि संघ और राज्यों को खातों का विवरण राष्ट्रपति के अनुसार (CAG की सलाह पर) रखना होगा।
- अनुच्छेद 151 कहता है कि संघ के खातों से संबंधित CAG की रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी जाएगी, जो संसद के प्रत्येक सदन के पटल पर रखी जाएगी।
- अनुच्छेद 279- ‘शुद्ध आय’ की गणना CAG द्वारा प्रमाणित की जाती है, जिसका प्रमाणपत्र अंतिम माना जाता है।
- तीसरी अनुसूची- भारत के संविधान की तीसरी अनुसूची की धारा IV भारत के CAG और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा पदभार ग्रहण के समय ली जाने वाली शपथ का प्रावधान करती है।
- छठी अनुसूची के अनुसार, ज़िला परिषद या क्षेत्रीय परिषद के खातों को राष्ट्रपति और CAG द्वारा अनुमोदित प्रारूप के अनुसार रखा जाना चाहिये।
- इन निकायों के खाते का लेखा-जोखा इस तरह से करना होगा जिस प्रकार CAG उचित समझता है और ऐसे खातों से संबंधित रिपोर्ट राज्यपाल को प्रस्तुत की जाएगी, जो विधानमंडल के समक्ष रखी जाती है।
कैग की स्वायत्तता
- CAG की स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिये संविधान में कई प्रावधान किये गए हैं।
- CAG राष्ट्रपति की सील और वारंट द्वारा नियुक्त किया जाता है और इसका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है। ( दोनों में से जो भी पहले हो)
- CAG को राष्ट्रपति द्वारा केवल संविधान में दर्ज प्रक्रिया के अनुसार हटाया जा सकता है जो कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के तरीके के समान है।
- एक बार CAG के पद से सेवानिवृत्त होने/इस्तीफा देने के बाद वह भारत सरकार या किसी भी राज्य सरकार के अधीन किसी भी कार्यालय का पदभार नहीं ले सकता।
- CAG का वेतन और अन्य सेवा शर्तें नियुक्ति के बाद भिन्न (कम) नहीं की जा सकतीं।
- उसकी प्रशासनिक शक्तियाँ और भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा विभाग में सेवारत अधिकारियों की सेवा शर्तें राष्ट्रपति द्वारा उससे परामर्श के बाद ही निर्धारित की जाती हैं।
- CAG के कार्यालय का प्रशासनिक व्यय, जिसमें सभी वेतन, भत्ते और पेंशन शामिल हैं, भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं जिन पर संसद में मतदान नहीं हो सकता।
CAG के कार्य और शक्तियाँ
- CAG को विभिन्न स्रोतों से ऑडिट करने के अधिकार प्राप्त हैं, जैसे-
- संविधान का अनुच्छेद 148 से 151
- नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (कर्त्तव्य, शक्तियाँ और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971
- महत्त्वपूर्ण निर्णय
- भारत सरकार के निर्देश
- लेखा और लेखा-परीक्षा विनियम, 2017
- CAG भारत की संचित निधि और प्रत्येक राज्य, केंद्रशासित प्रदेश जिसकी विधानसभा होती है, की संचित निधि से संबंधित खातों के सभी प्रकार के खर्चों का परीक्षण करता है।
- भारत की आकस्मिक निधि और भारत के सार्वजनिक खाते के साथ-साथ प्रत्येक राज्य की आकस्मिक निधि और सार्वजनिक खाते से होने वाले सभी खर्चों का परीक्षण करता है।
- केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के किसी भी विभाग के सभी ट्रेडिंग, विनिर्माण, लाभ- हानि खातों, बैलेंस शीट और अन्य अतिरिक्त खातों का ऑडिट करता है।
- संबंधित कानूनों द्वारा आवश्यक होने पर वह केंद्र या राज्यों के राजस्व से वित्तपोषित होने वाले सभी निकायों, प्राधिकरणों, सरकारी कंपनियों, निगमों और निकायों की आय-व्यय का परीक्षण करता है।
- राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा अनुशंसित किये जाने पर किसी अन्य प्राधिकरण के खातों का ऑडिट करता है, जैसे- कोई स्थानीय निकाय।
- केंद्र और राज्यों के खाते जिस प्रारूप में रखे जाएंगे, उसके संबंध में राष्ट्रपति को सलाह देता है।
- केंद्र के खातों से संबंधित अपनी ऑडिट रिपोर्ट को राष्ट्रपति को सौंपता है, जो संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखी जाती है।
- किसी राज्य के खातों से संबंधित अपनी ऑडिट रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपता है, जो राज्य विधानमंडल के समक्ष रखी जाती है।
- संसद की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) के मार्गदर्शक, मित्र और सलाहकार के रूप में भी कार्य करता है।
CAG और लोक लेखा समिति
(Public Accounts Committee- PAC)
- लोक लेखा समिति भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत गठित एक स्थायी संसदीय समिति है।
- CAG की ऑडिट रिपोर्ट केंद्र और राज्य में लोक लेखा समिति को सौंपी जाती है।
- विनियोग खातों, वित्त खातों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर ऑडिट रिपोर्ट की जाँच लोक लेखा समिति द्वारा की जाती है।
- केंद्रीय स्तर पर इन रिपोर्टों को CAG द्वारा राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है, जो संसद में दोनों सदनों के पटल पर रखी जाती हैं।
- CAG सबसे ज़रूरी मामलों की एक सूची तैयार करके लोक लेखा समिति को सौंपता है।
- CAG कभी-कभी राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों के विचारों की व्याख्या और अनुवाद भी करता है।
- CAG यह देखता है कि उसके द्वारा प्रस्तावित सुधारात्मक कार्रवाई की गई है या नहीं। यदि नहीं तो वह मामले को लोक लेखा समिति के पास भेज देता है जो मामले पर आवश्यक कार्रवाई करती है।
चुनौतियाँ तथा अवसर
- वर्तमान समय में सरकारी ऑडिट करना जटिल होता जा रहा है क्योंकि भ्रष्टाचार और प्रशासन में खामियों का पता लगाना आसान नहीं है।
- केंद्र और राज्य सरकारों पर कड़ी नजर रखने के साथ ही CAG अब कई सार्वजनिक-निजी सहभागी परियोजनाओं (PPP) का ऑडिट भी करता है।
- CAG की नियुक्ति के लिये कोई मानदंड या प्रक्रिया संविधान या कानून में निर्धारित नहीं की गई है।
- कार्यपालिका को यह शक्ति दी गई है कि वह अपनी पसंद के व्यक्ति को CAG के रूप में नियुक्त कर सके। यह विश्व में प्रचलित तरीकों के साथ मेल नहीं खाता।
- CAG को किसी भी सरकारी कार्यालय का निरीक्षण करने और किसी भी खाते को मांगने का अधिकार है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर ऐसा नहीं हो पाता।
- इसके अलावा ऑडिट में बाधा डालने के उद्देश्य से महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों की आपूर्ति ऑडिट प्रक्रिया के अंत में की जाती है।
- RTI अधिनियम 2005 के तहत नागरिकों के एक महीने के भीतर जानकारी प्राप्त करने के अधिकार की तरह ऑडिटरों को भी सात दिनों के भीतर प्राथमिकता के आधार पर रिकॉर्ड उपलब्ध किये जाने चाहिये। ऐसा नहीं हो पाने की स्थिति में संबंधित विभागों के प्रमुखों को इसकी वज़हों को स्पष्ट करना चाहिये।
- वर्ष 2015 में संसद और राज्य/केंद्रशासित प्रदेशों के विधानमंडलों ने लोक लेखा समिति के अखिल भारतीय सम्मेलन में CAG की पूर्ण स्वायत्तता और लोक लेखा समिति का सदस्य बनाए जाने पर चर्चा की, जैसा कि UK और ऑस्ट्रेलिया में होता है।
- हालाँकि भारतीय संविधान CAG को छह साल का कार्यकाल प्रदान करता है, लेकिन 65 साल उम्र की शर्त इसके वास्तविक कार्यकाल की अवधि को कम कर सकती है। कार्यकाल कम होने से नेतृत्व, निरंतरता और विशेषज्ञता की कमी के कारण संस्था के स्वतंत्र और उचित कामकाज में बाधा उत्पन्न होती है।
- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर UK के CAG और अमेरिका के नियंत्रक महाप्रबंधक का कार्यकाल क्रमशः 10 और 15 वर्ष होता है।
- संघ और राज्यों के खातों के ऑडिट का काम वास्तव में Indian Audit and Accounts Department (IA&AD) के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा किया जाता है। हालाँकि भारत में IA&AD के कार्य को वैधानिक मान्यता नहीं दी गई है, जैसा कि UK के राष्ट्रीय लेखा परीक्षा कार्यालय (National Audit Office) में होता है।
- IT एक्ट की तर्ज पर IA&AD को सांविधिक निकाय के रूप में मान्यता देने और शक्तियाँ प्रदान करने से ऑडिट की गुणवत्ता में सुधार होगा तथा IA&AD के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा किये गए कार्यों की विश्वसनीयता बढ़ेगी।
पूर्व CAG विनोद राय द्वारा सुझाए गए सुधार
- CAG के दायरे में सभी निजी-सार्वजनिक सहभागी (PPP), पंचायती राज संस्थान और सरकार द्वारा वित्तपोषित संस्थानों को लाना चाहिये।
- 1971 के CAG एक्ट में संशोधन किया जाना चाहिये ताकि शासन में बदलाव से ताल-मेल हो सके।
- नया CAG चुनने के लिये मुख्य सतर्कता आयुक्त (CVC) के चयन की तरह एक कॉलेजियम जैसा तंत्र होना चाहिये।
तौर-तरीकों में बदलाव की ज़रूरत
- हालिया समय में कुछ ऑडिट के दौरान नुकसान के बढ़े हुए अनुमानों या बाहरी आँकड़ों के कारण CAG की आलोचना हुई है। इस तरह के आरोपों से बचने के लिये CAG को कठोर मानकों का पालन करना चाहिये ताकि ऑडिट की अखंडता बाहरी विचारों से प्रभावित न हो।
- सरकारी धन और सार्वजनिक वस्तुओं का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है। इसे रोकने के लिये CAG को अपने ऑडिट तंत्र में बदलाव करने चाहिये।
- CAG को सतत विकास लक्ष्यों का ऑडिट करने और GST के कार्यान्वयन जैसे मुद्दों की जाँच के लिये तैयार किया जाना चाहिये।
- बिग डेटा क्रांति के मद्देनज़र CAG ने वर्ष 2016 में बिग डेटा मैनेजमेंट पॉलिसी के साथ काम किया तथा दिल्ली में डेटा मैनेजमेंट एंड एनालिटिक्स के लिये एक केंद्र भी स्थापित किया।
- CAG ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय का सफलतापूर्वक ऑडिट किया, जिसमें विविध जटिल कार्य शामिल थे। यह भारत के CAG की विश्वसनीयता को दर्शाता है।
भारत के राष्ट्रपति
भारत के राष्ट्रपति की शक्तियां व कार्य(The powers and functions of the President of India)
- अनुच्छेद – 53 के अनुसार भारत में संघीय कार्यपालिका का प्रधान राष्ट्रपति होता है तथा कार्यपालिका की शक्तियां उनके हाथों में निहित होती हैं |
प्रशासनिक शक्ति (Administrative power)
- राष्ट्रपति संघ की कार्यपालिका का औपचारिक प्रधान है अतः संघीय कार्यपालिका के सारे कार्य राष्ट्रपति के नाम से किए जाते हैं |
नियुक्ति संबंधी अधिकार (Recruitment rights)
- भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री संघ के अन्य मंत्री महान्यायवादी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश राज्यपाल जल विवाद आयोग वित्त आयोग संघ लोक सेवा आयोग मुख्य एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त एवं राज्य भाषा आयोग आदि की नियुक्ति करता है |
- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में अनुच्छेद – 124 (2) के तहत राष्ट्रपति से अपेक्षा की जाती है कि उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों से परामर्श करें जिनसे ऐसा करना आवश्यक समझे |
- राष्ट्रपति को मंत्री महान्यायवादी राज्यपाल उच्चतम न्यायालय के प्रतिकूल टिप्पणी पर संघ एवं राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य संसद की अनुसंशा पर उच्चतम या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अथवा निर्वाचन आयुक्त आदि को पदमुक्त करने का अधिकार है |
सैन्य शक्ति (military power)
- राष्ट्रपति सशस्त्र सैन्य बलों का प्रधान होता है तथा तीनों सेनाओं वायु थल एवं जल के अध्यक्षों की नियुक्ति करता है परंतु राष्ट्रपति के अधिकार विधायी नियंत्रण से बाहर नहीं है
राजनीति शक्ति (Political power)
राजनीति शक्ति का विषय व्यापक है परंतु फिर भी इसके तहत निम्न विषय रखे जा सकते हैं
- विदेशों से संधियां किया जाना
- विदेश नीति का निर्धारण
- विदेश नीति का संचालन
- अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों में भारत का प्रतिनिधित्व
विधायी शक्ति (Legislative power)
- भारत के राष्ट्रपति की विधायी शक्तियां जिनका प्रयोग अनुच्छेद – 74(1) के तहत मंत्रियों की सलाह पर ही होगा कई प्रकार की हैं तथा उन पर निम्न शीर्षकों के प्रति विचार किया जा सकता है |
संसद का सत्र आहूत करना सत्रावसान विघटन (Session call session session dissolution)
- इसके तहत राष्ट्रपति को संसद के सदनों को आहूत करने या उसका सत्रावसान करने तथा लोकसभा का विघटन करने की शक्ति है |
- गतिरोध हो जाने पर उसे अनुच्छेद – 85 एवं 108 के अनुसार दोनों सदनों की संयुक्त बैठक भी आहूत करने की शक्ति है |
आरंभिक अभिभाषण (Introductory address)
- राष्ट्रपति अनुच्छेद – 87 के अनुसार लोकसभा के साधारण निर्वाचन के पश्चात प्रथम सत्र के आरंभ में एक साथ समवेत संसद के दोनों सदनों में अभिभाषण करेगा और संसद को उसके आह्वान का कारण बताएगा |
सदनों में सदस्यों को नामित करने का अधिकार(Right to nominate members in the Houses)
- राष्ट्रपति अनुच्छेद – 80 एक के तहत राज्य सभा में 12 एवं अनुच्छेद – 331 के तहत लोकसभा में दो सदस्यों को नामित कर सकता है |
प्रतिवेदन (Report)
- बजट सीएजी का प्रतिवेदन वित्त आयोग की सिफारिश तथा विभिन्न आयोगों के प्रतिवेदन से संबंधित दस्तावेज संसद के समक्ष रखने की शक्ति राष्ट्रपति की है |
विधायक के लिए पूर्व मंजूरी (Former sanction for legislator)
- संविधान मे यह अपेक्षा की गई है कि कुछ विषयों पर कानून का निर्माण करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी की आवश्यकता है –
- अनुच्छेद – 3 के अनुसार नए राज्यों के निर्माण का वर्तमान राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन करने वाले विधान की सिफारिश करने की अन्यन शक्ति राष्ट्रपति को दी गई है ताकि ऐसा करने के पूर्व प्रभावित राज्यों के विचार प्राप्त कर सकें|
- अनुच्छेद – 117 (1) के अनुसार धन विधेयक सदन के पटल पर रखने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है |
- अनुच्छेद – 304 के तहत व्यापार की स्वतंत्रता पर किसी प्रकार का प्रतिबंध अधिरोपित करने वाले विधेयक को सदन के पटल पर रखने के पूर्व राष्ट्रपति की मंजूरी आवश्यक है |
विधेयक कानूनी रूप (Bill legal form)
- कोई विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ही कानून का रूप लेता है |
वीटो (Veto)
- भारत के राष्ट्रपति को संसद द्वारा पारित विधेयक को पर निषेधाधिकार करने का अधिकार इतना प्रभावशाली नहीं है जितना कि अमेरिका में है |
आत्यंतिक वीटो (Ultimate veto)
- जब कभी ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होती है कि किसी सरकारी विधेयक को संसद द्वारा पारित कर दिया गया एवं राष्ट्रपति की अनुमति मिलने के पूर्व ही सरकार किसी कारणवश भंग हो गई तथा नहीं सरकार ने उसे रद्द करने की सिफारिश कर दी तो राष्ट्रपति अगर उक्त विधेयक को पारित करना आवश्यक समझे तो उस पर वीटो कर सकता है |
निलंबनकारी वीटो (Suspension veto)
- राष्ट्रपति इसका प्रयोग संसद द्वारा पारित विधेयक को एक बार पुनर्विचार करने के लिए भेजकर करता है |
जेबी वीटो (JB veto)
- जब राष्ट्रपति संसद द्वारा पारित विधेयक को न तो पुनर्विचार के लिए वापस भेजता है और ना ही उस पर अनुमति देता है और नहीं अनुमति देने से इंकार करता है इस स्थिति में विधेयक राष्ट्रपति की जेब में पड़ा रहता है और उसे जेबी वीटो कहते हैं |
- इस वीटो का प्रथम प्रयोग 1986 ईस्वी में संसद द्वारा पारित भारतीय डाक संशोधन विधेयक 1986 पर हुआ जब तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह मीणा तो इस पर अनुमति दी और नहीं इनकार किया यह अभी भी राष्ट्रपति की जेब में पड़ा हुआ है |
अध्यादेश जारी करने का अधिकार (Right to issue ordinance)
- जब संसद का सत्र न चल रहा हो एवं किसी विधान की तुरंत की आवश्यकता हो तो राष्ट्रपति इस परिस्थिति में अध्यादेश जारी कर सकता है ऐसे अध्यादेशों का वही प्रभाव होता है जो किस संसदीय अधिनियम का होता है |
- परंतु संसद का सत्र प्रारंभ होने की तिथि से 6 सप्ताह के भीतर इस अध्यादेश को संसद की स्वीकृति मिलना आवश्यक है अन्यथा यह स्वत: निरस्त मान लिया जाता है |
- इस अध्यादेश का प्रयोग अनुच्छेद – 352 में वर्णित आपात स्थिति के संदर्भ में नहीं किया जा सकता |
क्षमादान का अधिकार (Right of forgiveness)
- भारतीय संविधान भी विश्व के अन्य संविधानों की भांति राष्ट्रीय अध्यक्ष को निम्न सरकार के व्यक्तियों को अनुच्छेद – 72 के तहत क्षमा करने का अधिकार प्रदान करता है –
- जिन्हें न्यायालय द्वारा किसी अपराध के लिए विधिवत दंडित किया गया है |
- उन सभी मामलों में जिन में कोर्ट मार्शल द्वारा दंड दिया गया है |
- उन सभी मामलों में जहां मृत्यु दंड दिया गया है |
इसके तहत राष्ट्रपति दंडित व्यक्ति को पूर्ण क्षमा दे सकता है अथवा उसकी संज्ञा को कम कर सकता है क्षमादान का अधिकार एक अनुग्रह अधिकार है |
राष्ट्रपति की आपात शक्तियाँ (Presidential Emergency Powers)
(भाग 18 अनुच्छेद 352 से 360)
राष्ट्रीय आपात (National emergency)
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद – 352 के अनुसार युद्ध, बाह्य आक्रमण एवं आंतरिक उपद्रव की स्थिति में राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपात की उदघोषणा कर सकता है |
- परंतु ऐसी भी उद्घोषणा अनुच्छेद – 352 (3) के अनुसार राष्ट्रपति तभी कर सकता है जब प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिमंडल राष्ट्रपति से लिखित रूप में संतुति करें |
- राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 352 का प्रयोग करने के लिए आवश्यक नहीं है कि युद्ध बाहर आक्रमण आंतरिक उपद्रव हो ही गया हो बल्कि ऐसी आशंका पर भी राष्ट्रीय आपात उद्घोषित कर सकता है |
- 44 वें संशोधन के अनुसार अनुच्छेद 352 का प्रयोग न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है |
- अनुच्छेद 352 की उद्घोषणा के एक माह के भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा इसके समर्थन में संकल्प प्रस्ताव अगर पारित नहीं होता तो राष्ट्रीय आपात की उदघोषणा स्वत: समाप्त हो जाती है |
- संसद द्वारा अनुमोदित होने के पश्चात राष्ट्रीय आपात की उदघोषणा 6 महीने तक वैध रहती है |
- इस उद्घोषणा के अधीन संघ को असाधारण कार्यपालिका तथा विधायी शक्तियां प्राप्त रहती हैं प्रांतों की सरकारें संघ सरकार के निर्देशानुसार चलती हैं |
- राष्ट्रीय आपात के प्रवर्तन अवधि में अनुच्छेद 353 (क) के तहत संघीय कार्यपालिका प्रांतों को किसी भी विषय पर निर्देश दे सकती है जबकि साधारण परिस्थितियों में ऐसा वह सिर्फ अनुच्छेद 256 एवं 257 में विनिर्दिष्ट विषय में ही कर सकती है |
- राष्ट्रीय आपात के दौरान संसद विधि द्वारा लोकसभा की अवधि में 1 वर्ष की वृद्धि कर सकती है जबकि अनुच्छेद 83 (2) के तहत साधारण परिस्थितियों में 6 महीने के लिए किया जा सकता है |
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संपूर्ण देश या देश के किसी हिस्से में किया जा सकता है अभी तक तीन बार 1962 (चीनी आक्रमण के समय) 1971 (पाकिस्तानी आक्रमण के समय) एवं 1975 (आंतरिक अशांति के नाम पर) राष्ट्रीय आपात लागू हो चुकी हैं |
राष्ट्रपति शासन (President’s Rule)
- किसी प्रांत में संवैधानिक तंत्र की विफलता की स्थिति में अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है |
- इसकी उद्घोषणा राज्यपाल एवं केंद्रीय मंत्रिमंडल की संस्तुतियों के आधार पर होती है |
- इस उद्घोषणा के प्रवर्तन काल में राज्य की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति के हाथों में एवं विधायक का शक्ति संसद के हाथों में होती है जब के प्रांतीय न्यायपालिका पूर्व की भांति ही कार्यरत करती है |
- सांविधानिक तंत्र की विफलता के कारण घोषित राष्ट्रपति शासन की अधिकतम अवधि 3 वर्षों की होती है परंतु 6 महीने पर संसद द्वारा अनुमोदन प्रस्ताव पारित करते रहना आवश्यक है |
- अभी तक 110 से अधिक बार यह उद्घोषणा हो चुकी है सबसे पहले पंजाब में लागू हुई |
वित्तीय आपात (Financial emergency)
- जब देश के वित्तीय साख पर खतरा उत्पन्न हो जाता है तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 360 के तहत इस की उद्घोषणा करके सारी वित्तीय शक्तियां के हाथ में ले लेता है|
याचिका (रिट)
याचिका (रिट) और उनका विषय क्षेत्र
एक रिट अथवा याचिका का अर्थ है –आदेश, यानि वह कुछ भी जिसे एक अधिकार के तहत जारी किया जाता है वह याचिका है, और इसे रिट के रूप में जाना जाता है। अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के तहत भारतीय संविधान के तीसरे भाग में प्रदत्त मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए भारत का संविधान उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को अधिकार प्रदान करता है।
एक रिट अथवा याचिका का अर्थ है –आदेश, यानि वह कुछ भी जिसे एक अधिकार के तहत जारी किया जाता है वह याचिका है, और इसे रिट के रूप में जाना जाता है। अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के तहत भारतीय संविधान के तीसरे भाग में प्रदत्त मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए भारत का संविधान उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को अधिकार प्रदान करता है।
याचिकायें (रिट) के पांच प्रकार की होती हैं –
- बन्दी प्रत्यक्षीकरण,
- परमादेश,
- उत्प्रेषण,
- निषेधाज्ञा
- अधिकार पृच्छा,
पांच प्रकार की याचिकाओं (रिट) का वर्णन निम्नवत् है:
1- बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है कि "आपके पास शरीर होना चाहिए"।
रिट एक अदालत के समक्ष एक ऐसे आदमी को पेश करने के लिए जारी की जाती है जिसे हिरासत
में या जेल में रखा गया है और हिरासत में लेने के 24 घंटे के भीतर उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश
नहीं किया गया है और यदि यह पाया जाता है कि हिरासत में अवैध तरीके से रखा गया है तो कोर्ट ऐसे
व्यक्ति को रिहा करा देती है। रिट का उद्देश्य अपराधी को दंडित करने का नहीं होता
लेकिन अवैध तरीके से हिरासत में लिए गये व्यक्ति को रिहा कराना होता है।
हालांकि, अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) को आपातकाल की घोषणा
के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता है। इसलिए, बंदी प्रत्यक्षीकरण एक व्यक्ति की व्यक्तिगत
स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए एक बहुत ही मूल्यवान रिट बन जाती है। सुप्रीम कोर्ट केवल मौलिक
अधिकारों के उल्लंघन के मामले में ही राज्य के खिलाफ बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट जारी कर सकता है जबकि
उच्च न्यायालय अवैध रूप से या मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गये किसी भी आम नागिरक के खिलाफ
भी यह जारी कर सकता है। बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट हिरासत में लिया गये व्यक्ति द्वारा स्वंय या उसकी
ओर से कोई भी व्यक्ति दायर कर सकता है।
सुनील बत्रा II बनाम दिल्ली प्रशासन का मामला: सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश को एक अपराधी द्वारा एक पत्र लिखा गया था जिसे एक रिट को याचिका के रूप में लिया गया था। न्यायालय ने इस रिट को राज्य की दंडात्मक सुविधाओं की उपेक्षा के लिए नियोजित किया था। यह रिट तब जारी की गयी थी जब जेल के साथियों को कानूनी सहायता प्रदान करने और उनका साक्षात्कार करने के लिए कानून के छात्रों पर प्रतिबंध लगाया गया था।
2- परमादेश (Mandamus)
Mandamus (परमादेश) एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है "हमारा आदेश है।" यह कानूनी रूप से कार्य करने और गैर कानूनी कार्य के अंजाम से बचने के लिए, एक आदेश के रूप में एक न्यायिक उपाय है। जहां A के पास कानूनी अधिकार होते हैं जो B पर कुछ कानूनी बाध्यताएं डालता है, B को अपने कानूनी कर्तव्यों का पालने करने के लिए A परमादेश रिट की मांग कर सकता है। इस रिट को जारी करने का आदेश उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा तब किया जाता है जब सरकार, अदालत, निगम या अधिकरण या लोक प्राधिकरण सार्वजनिक या वैधानिक कर्तव्य तो करते हैं लेकिन उन्हें निभा पाने में विफल रहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट एक व्यक्ति के मौलिक अधिकार को लागू करने के लिए एक परमादेश तब जारी कर सकता है जब कुछ सरकारी आदेशों या अधिनियमों पर इसका उल्लंघन करने का आरोप लगाये जाते हैं। एक अधिकारी को अपने संवैधानिक और कानूनी शक्तियों का प्रयोग करने के लिए, कर्तव्यों का पालन नहीं करने पर संविधान द्वारा किसी भी व्यक्ति के लिए निर्धारित कर्तव्यों के निर्वहन करने हेतु मजबूर करने के लिए, अपनी अधिकारिता का प्रयोग करने के लिए और सरकार को किसी भी अंसवैधानिक कानून लागू नहीं करने के सरकारी आदेश की न्यायिक मजबूरी के लिए उच्च न्यायालय सीधे अथवा प्रत्यत्क्ष तरीके से रिट जारी कर सकते हैं।
भारत सरकार बनाम उन्नी कृष्णन मामले में यह कहा गया कि सहायता और संबद्धता के सवाल की परवाह किए बगैर एक निजी चिकित्सा/ इंजीनियरिंग कॉलेज अदालत की रिट क्षेत्राधिकार के भीतर आता है।
3- उत्प्रेषण (Certiorari)
Certiorari (उत्प्रेषण) एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ 'सूचित करने के लिए' है। 'उत्प्रेषण' को एक न्यायिक आदेश के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो आचरण से संबंधित होता है और कानूनी कार्यवाही में उपयोग किया जाता है। इसे निगम जैसे संवैधानिक और सांविधिक निकायों, कंपनियों और सहकारी समितियों जैसे निकायों और सहकारी समितियों तथा निजी निकायों तथा व्यक्तियों के खिलाफ जारी अदालत द्वारा प्रमाणित और कानून के अनुसार किसी भी कार्रवाई के रिकार्ड की आवश्यकता होती है।
ऐसे विभिन्न प्रकार के आधार हैं जिसके आधार पर उत्प्रेषण की रिट जारी की जाती है:
1) अधिकार क्षेत्र का अभाव
2) न्याय क्षेत्र का दुरूपयोग
3) अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग
4) समान न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन।
सैय्यद याकूब बनाम राधाकृष्णन मामले में, यह कहा गया कि उत्प्रेषक्ष की रिट जारी करना उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का एक पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार है और इस पर अदालती कार्यवाही एक अपीलीय अदालत के रूप में कार्य करने की पात्र नहीं है। कानून की एक त्रुटि जो स्पष्ट रूप से द्स्तावेजों में अंकित है को तो रिट द्वारा सुधारा जा सकता है लेकिन तथ्य की त्रुटि को सहीं नहीं किया जा सकता है। हालांकि, यदि एक तथ्य का निष्कर्ष 'कोई सबूत नहीं है' पर आधारित है तो इसे कानून की एक त्रुटि के रूप मे माना जाएगा जिसे उत्प्रेषण द्वारा ठीक किया जा सकता है।
4- निषेधाज्ञा (Prohibition)
निषेधाज्ञा का अर्थ है "मना करना या बंद करना" और आम बोलचाल में इसे 'स्टे आर्डर' के रूप में जाना जाता है। जब कोई निचली अदालत या एक अर्ध न्यायिक निकाय एक विशेष मामले में अपने अधिकार क्षेत्र में प्रद्त्त अधिकारों को अतिक्रमित कर किसी भी मुक़दमें की सुनवाई करती है तो सुप्रीम कोर्ट या अन्य कोई भी उच्च न्यायालय द्वारा रिट जारी की जाती है। भारत में, निषेधाज्ञा को मनमाने प्रशासनिक कार्यों से व्यक्ति की रक्षा के लिए जारी किया जाता है।
5- अधिकार पृच्छा (Quo warranto)
Quo warranto एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है "किस वारंट द्वारा"। जब न्यायालय को लगता है कि कोई व्यक्ति ऐसे पद पर नियुक्त हो गया है जिसका वह हकदार नहीं है तब न्यायालय इस (अधिकार पृच्छा) को जारी कर सकता है और व्यक्ति को उस पद पर कार्य करने से रोक देता है। संविधान द्वारा निर्मित कार्यालयों के खिलाफ इसे जारी किया जा सकता है जैसे- एडवोकेट जनरल, विधान सभा के अध्यक्ष, नगर निगम अधिनियम के तहत वाले अधिकारी, एक स्थानीय सरकारी बोर्ड के सदस्य, विश्वविद्यालय के अधिकारी और शिक्षक। लेकिन इसे निजी स्कूलों की प्रंबंध समिति के खिलाफ जारी नहीं किया जाता है क्योंकि उनकी नियुक्ति किसी प्राधिकरण के तहत नहीं होती है।
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