Monday, April 6, 2020

विधायिका, कार्यपालिका

विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और राज्यपाल की भूमिका

संदर्भ

लगभग 14 महीने से कर्नाटक में सरकार को लेकर चल रही अस्थिरता एक सप्ताह तक चले ड्रामे के बाद 23 जुलाई को तब समाप्त हो गई, जब सत्तारूढ़ कॉन्ग्रेस और जद (यू) की सरकार विश्वास मत हार गई और मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने इस्तीफा दे दिया। इस सारी कवायद के दौरान विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और राज्यपाल की भूमिका का मुद्दा बार-बार चर्चा में आता रहा, क्योंकि ये चारों ही इस प्रक्रिया के दौरान सक्रिय रहे।
आज़ादी के बाद भारतीय संविधान के निर्माताओं ने देश के लोकतंत्र को मज़बूत बनाने और शासन व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिये केंद्रीय स्तर पर जहाँ संसद की व्यवस्था की, वहीं राज्यों में विधानसभा के गठन का प्रस्ताव किया। इसके साथ ही लोकसभा के संचालन और गरिमा बनाए रखने के लिये लोकसभा अध्यक्ष और राज्यों में विधानसभा अध्यक्ष के पद का प्रावधान किया।
राज्यों में विधानसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही और उसकी गतिविधियों के संचालन के लिये पूरी तरह जवाबदेह होता है। विधानसभा अध्यक्ष से यह अपेक्षित होता है कि वह दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सभी दलों के साथ तालमेल बनाकर इस पद की गरिमा को बरकरार रखेगा। विधानसभा अध्यक्ष का निर्विरोध निर्वाचित होना और उसका किसी भी दल के प्रति झुकाव नहीं होने वाला स्वरूप समाज की उस राजनीतिक जागरूकता का प्रतीक है जो लोकतंत्रीय व्यवस्था की प्रमुख आधारशिला है।
सीधे-सरल शब्दों में कहें तो विधायिका का काम कानून बनाना है, कार्यपालिका कानूनों को लागू करती है और न्यायपालिका कानून की व्याख्या करती है। इन तीनों को लोकतंत्र का आधार-स्तंभ माना जाता है।

विधानसभाध्यक्ष के कर्त्तव्य और अधिकार

विधानसभा अध्यक्ष राज्य विधायिका का एक प्रमुख अंग होता है। हालिया कर्नाटक मामले में हमने देखा कि राज्यपाल से कई बार समय-सीमा का अल्टीमेटम मिलने के बाद भी विधानसभाध्यक्ष ने अपने विवेकानुसार ही राज्यसभा में शक्ति परीक्षण कराया। यह मामला सर्वोच्च न्यायालय तक गया, लेकिन उसने भी विधानसभाध्यक्ष को कोई भी निर्देश न देते हुए उनके अधिकारों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
राज्यों की विधायिका विधानसभा के लिये निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से गठित होती है। इन जनप्रतिनिधियों को विधायक कहा जाता है।
  • विधानसभा की कार्यवाही को सुचारु रूप से संचालित करने के लिये एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष का प्रावधान संविधान में है।
  • विधानसभा का गठन होने के बाद उसके प्रथम सत्र में ही विधानसभा सदस्यों द्वारा विधानसभा अध्यक्ष चुना जाता है।
  • अध्यक्ष के अलावा विधानसभा के सदस्य उपाध्यक्ष का चुनाव भी करते हैं, जो अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उसका कार्यभार संभालता है।
विधानसभा अध्यक्ष के प्रमुख कार्यों में वही सब कार्य आते हैं, जो लोकसभा अध्यक्ष करता है, जैसे-
  • सदन में अनुशासन बनाए रखना
  • सदन की कार्यवाही का सुचारु रूप से संचालन करना
  • सदस्यों को बोलने की अनुमति प्रदान करना
  • पक्ष और विपक्ष में समान मत आने पर निर्णायक मत प्रदान करना
पीठासीन अधिकारी यानी विधानसभा अध्यक्ष विधानसभा एवं विधानसभा सचिवालय का प्रमुख होता है, जिसे संविधान, प्रक्रिया, नियमों एवं स्थापित संसदीय परंपराओं के तहत व्यापक अधिकार प्राप्त होते हैं। विधानसभा के परिसर में उसका प्राधिकार सर्वोच्च है। सदन की व्यवस्था बनाए रखना उसकी ज़िम्मेदारी होती है और वह सदन में सदस्यों से नियमों का पालन सुनिश्चित कराता हैं। विधानसभा अध्यक्ष सदन के वाद-विवाद में भाग नहीं लेता, बल्कि विधानसभा की कार्यवाही के दौरान अपनी व्यवस्थाएँ/निर्णय देता है, जो बाद में नज़ीर के रूप में संदर्भित की जाती हैं। विधानसभा में अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष सदन का संचालन करता है और दोनों की अनुपस्थिति में सभापति रोस्टर का कोई एक सदस्य यह ज़िम्मेदारी निभाता है।

विधानसभा सचिवालय

संविधान में यह उपबंध किया गया है कि प्रत्येक विधानसभा का अपना एक पृथक सचिवालय होगा, जिसका प्रशासकीय नियंत्रण विधानसभा अध्यक्ष के पास होगा। सचिवालय में विधानसभा के कार्य संपादित करने हेतु अधिकारी एवं कर्मचारी कार्यरत रहते हैं।
वर्तमान समय में विधानसभा द्वारा जो कार्य संपादित किये जाते हैं, उनका स्वरूप बहुत व्यापक होता है। चूँकि विधानसभा की बैठकें सीमित समय के लिये होती हैं, अत: विधानसभा के लिये यह संभव नहीं होता कि वह प्रत्येक कार्य की स्वयं सूक्ष्म जाँच करे अथवा उस पर गहन विचार-विमर्श कर सके। ऐसे में विधानसभा कतिपय कार्यों को समितियों के माध्यम से संपादित करती है। विधान सभा समितियों के माध्यम से कार्यपालिका पर प्रभावी नियंत्रण रखती है। विधानसभा की विभिन्न समितियाँ शासन से वांछित जानकारी प्राप्त करती हैं, उसका परीक्षण करती हैं। विभागीय सचिवों का मौखिक साक्ष्य लेती हैं। आवश्यकतानुसार स्थल निरीक्षण एवं अन्य राज्यों के अध्ययन हेतु दौरा भी करती हैं। परीक्षण उपरांत समितियाँ अपने प्रतिवेदन सिफारिशों के साथ समय-समय पर विधानसभा में प्रस्तुत करती हैं। यह कार्य पूरे वर्ष अनवरत चलता है।

कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका

जैसा कि हम बता चुके हैं, हमारे संविधान में राज्य की शक्तियों को तीन अंगों में बाँटा गया है- कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका। इसके अनुसार विधानपालिका का काम विधि निर्माण करना, कार्यपालिका का काम विधियों का कार्यान्वयन तथा न्यायपालिका को प्रशासन की देख-रेख, विवादों का फैसला और विधियों की व्याख्या करने का काम सौंपा गया है।
न्यायपालिका: भारत की न्यायपालिका के बारे में कहा जा सकता है कि जैसा इसका नाम है वैसा ही इसका काम है। न्यायपालिका का मूल काम, हमारे संविधान में लिखे कानून का पालन करना और करवाना है तथा कानून का पालन न करने वालों को दंडित करने का अधिकार भी इसे प्राप्त है। भारतीय न्यायिक प्रणाली को अंग्रेज़ों ने औपनिवेशिक शासन के दौरान बनाया था और उसी के अनुसार यह आज भी देश में कानून व्यवस्था बनाए रखने का काम करती है। न्यायाधीश अपने आदेश और फैसले संविधान में लिखे कानून के अनुसार लेते हैं। न्‍यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के लिये है। न्‍यायपालिका विवादों को सुलझाती है, इसलिये इसकी स्‍वतंत्रता की रक्षा ज़रूर होनी चाहिये।
विधायिका: भारत संघ की विधायिका को संसद कहा जाता है और राज्यों की विधायिका विधानमंडल/ विधानसभा कहलाती है। देश की विधायिका यानी संसद के दो सदन हैं- उच्च सदन राज्यसभा तथा निचला सदन लोकसभा कहलाता है। राज्‍यसभा के लिये अप्रत्‍यक्ष चुनाव होता है, इसमें राज्‍यों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्‍यों का चुनाव एकल हस्‍तांतरणीय मत के द्वारा समानुपातिक प्रतिनिधित्‍व प्रणाली के अनुसार राज्‍यों की विधानसभाओं द्वारा निर्धारित तरीके से होता है। राज्‍यसभा को भंग नहीं किया जाता, बल्कि हर दूसरे वर्ष में इसके एक-तिहाई सदस्‍य सेवानिवृत्‍त होते हैं। वर्तमान में राज्‍यसभा में 245 सीटें हैं। उनमें से 233 सदस्‍य राज्‍यों और केंद्रशासित क्षेत्रों का प्रतिनिधित्‍व करते हैं और 12 सदस्‍य राष्‍ट्रपति द्वारा नामजद होते हैं।
लोकसभा जनप्रतिनिधियों की सभा है जिनका चुनाव वयस्‍क मतदान के आधार पर प्रत्‍यक्ष चुनाव द्वारा होता है। संविधान द्वारा परिकल्पित सदन के सदस्‍यों की अधिकतम संख्‍या 552 है (530 सदस्‍य राज्‍यों का प्रतिनिधित्‍व करने के लिये, 20 केंद्रशासित क्षेत्रों का प्रतिनिधित्‍व करने के लिये और एंग्लो-इंडियन समुदाय के दो सदस्‍य राष्‍ट्रपति द्वारा नामजद किये जा सकते हैं, यदि उसके विचार से उस समुदाय का सदन में पर्याप्‍त प्रतिनिधित्व नहीं है)। वर्तमान में लोकसभा में 545 सदस्‍य हैं। इनमें से 530 सदस्‍य प्रत्‍यक्ष रूप राज्‍यों से चुने गए हैं और 13 केंद्रशासित क्षेत्रों से, जब‍कि दो को एंग्लो-इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिये राष्‍ट्रपति द्वारा मनोनीत किया जाता है। लोकसभा का कार्यकाल इसकी पहली बैठक की तारीख से पाँच वर्ष का होता है, जब तक कि इसे पहले भंग न किया जाए।

कार्यपालिका

संघीय कार्यपालिका में राष्‍ट्रपति, उपराष्‍ट्रपति और राष्‍ट्रपति को सहायता करने एवं सलाह देने के लिये अध्‍यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री के साथ मंत्रिपरिषद होती है। केंद्र की कार्यपालिका शक्ति राष्‍ट्रपति को प्राप्‍त होती है, जो उसके द्वारा केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह पर संविधान सम्मत तरीके से इस्तेमाल की जाती है। राष्‍ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्‍य तथा राज्‍यों में विधानसभा के सदस्‍य समानुपातिक प्रतिनिधित्‍व प्रणाली के तहत मतदान करते हैं। उपराष्‍ट्रपति के चुनाव में एकल हस्तांतरणीय मत द्वारा संसद के दोनों सदनों के सदस्‍य मतदान के पात्र होते हैं।
राष्‍ट्रपति को उसके कार्यों में सहायता करने और सलाह देने के लिये प्रधानमंत्री के नेतृत्‍व में मंत्रिपरिषद होती है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्‍ट्रपति द्वारा की जाती है और वह प्रधानमंत्री की सलाह पर अन्‍य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्‍तरदायी होती है। संघ के प्रशासन या कार्य और उससे संबंधित विधानों और सूचनाओं के प्रस्‍तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयों की सूचना राष्‍ट्रपति को देना प्रधानमंत्री का कर्त्तव्य है। मंत्रिपरिषद में कैबिनेट मंत्री, राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) और राज्‍य मंत्री होते हैं।

तीनों के बीच संतुलन बेहद ज़रूरी

  • विधायिका, कार्यपालिका और न्या‍यपालिका को अपने सभी उत्तरदायित्‍व पूर्ण करने चाहिये तथा इन तीनों के बीच संतुलन को बनाए रखने के लिये किसी को भी दूसरे के कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये।
  • विभिन्न प्रावधानों के तहत संविधान ने विधायिका और न्यायपालिका के बीच संबंधित कार्यप्रणाली में अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिये स्पष्ट रूप से रेखा खींची है।
  • भारत के संविधान में शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का कहीं भी स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन सरकार के विभिन्न अंगों के कार्यों में पर्याप्त अंतर है। इस प्रकार सरकार का एक अंग दूसरे अंग के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
  • अनुच्छेद 121 और 211 विधायिका को अपने कर्त्तव्यों के निर्वहन में किसी भी न्यायाधीश के आचरण पर चर्चा करने से रोकते हैं, वहीं दूसरी तरफ अनुच्छेद 122 और 212 अदालतों को विधायिका की आंतरिक कार्यवाही पर निर्णय लेने से रोकते हैं।
  • संविधान के अनुच्छेद 105 (2) और 194 (2) विधायकों को उनकी भाषण की स्वतंत्रता और वोट देने की आज़ादी के संबंध में अदालतों के हस्तक्षेप से रक्षा करते हैं।
देखा यह गया है कि जब कार्यपालिका अपने दायित्व निर्वहन में विफल रहती है, तब न्यायपालिका उसके कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप करती है। 1972 में केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 13 जजों की अब तक की सबसे बड़ी संविधान पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट कर दिया था कि भारत में संसद नहीं बल्कि संविधान सर्वोच्च है। इस सिद्धांत के तहत संविधान में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र की लक्ष्मण रेखा स्पष्ट खींच दी गई है। कानून बनाना विधायिका का काम है, इसे लागू करना कार्यपालिका का और विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों के संविधान सम्मत होने या न होने की जाँच करना न्यायपालिका का काम है। इन तीनों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिये यह ज़रूरी है कि न्यायपालिका, संसद और कार्यपालिका के बीच एक-दूसरे के लिये आपसी सम्मान होना चाहिये और इन सभी पर किसी प्रकार का कोई 'बाहरी दबाव' नहीं होना चाहिये।

गठबंधन सरकारों के दौर में राज्यपाल की भूमिका

हाल ही में कर्नाटक में हुई राजनीतिक उठापटक में राज्यपाल वजुभाई वाला की भूमिका तब सामने आई, जब उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को सदन में शक्ति परीक्षण कराने का निर्देश कई बार दिया। भारत का संविधान संघात्मक है तथा इसमें संघ तथा राज्यों के शासन के संबंध में प्रावधान किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 153 से 156, 161,163 एवं 164(1) तथा 213(1) में राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों का उपबंध किया गया है। संघीय व्यवस्था में राज्यपाल राज्य और कार्यपालिका के औपचारिक प्रमुख के रूप में काम करता है, विशेषकर तब, जब राजनीतिक उथल-पुथल होती है। ऐसी स्थिति में जहाँ दो या अधिक दल सरकार बनाने का दावा पेश कर रहे हों, राज्यपाल को कानूनी एवं संवैधानिक पक्षों को ध्यान में रखते हुए निर्णय करना होता है। परंतु वर्तमान में राज्यपाल पद की प्रवृत्ति में व्यापक भिन्नता देखी गई है और इसकी नज़ीर कर्नाटक विधानसभा में देखी गई। ऐसे में यह कहना आतिशयोक्ति न होगा कि गठबंधन सरकारों के इस दौर में राज्यपाल की भूमिका केंद्र के एजेंट के रूप में अधिक परिलक्षित होती है। हालिया समय में मणिपुर, मेघालय और गोवा में राज्यपालों की ऐसी ही भूमिका देखने को मिली। परंतु राज्यपाल का यह निर्णय उसके स्वविवेक पर निर्भर होता है। संविधान का अनुच्छेद 163 राज्यपाल को विवेकाधिकार की शक्ति प्रदान करता है अर्थात् राज्यपाल स्वविवेक संबंधी कार्यों में मंत्रिपरिषद का सुझाव लेने के लिये बाध्य नहीं है। राज्यपाल की इन विवेकाधीन शक्तियों पर न्यायालय भी प्रश्नचिह्न नहीं लगा सकता।
  • राज्यपालों को केंद्र सरकार का एजेंट न समझा जाए, इसके लिये वर्ष 1966 में प्रशासनिक सुधार आयोग, वर्ष 1969 में राजमन्नार समिति, वर्ष 1970 में भगवान सहाय समिति, वर्ष 1988 में सरकारिया आयोग तथा वर्ष 2011 में पुंछी आयोग ने राज्यपालों की भूमिका को लेकर कई प्रकार की सिफारिशें दी थीं, लेकिन इन पर अमल किसी भी सरकार ने नहीं किया।

सदन में सिद्ध करना होता है बहुमत (बोम्मई जजमेंट)

यह मामला भी कर्नाटक से जुड़ा है। 13 अगस्त, 1988 से 21 अप्रैल, 1989 तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे एस.आर. बोम्मई की सरकार को फोन टैपिंग मामले में फँसने के बाद तत्कालीन राज्यपाल ने बर्खास्त कर दिया था, जिसके बाद यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुँचा था। नज़ीर माने जाने वाले इस फैसले में न्यायालय ने कहा, 'किसी भी राज्य सरकार के बहुमत का फैसला राजभवन आदि की जगह विधानमंडल में होना चाहिये। राष्ट्रपति शासन लगाने से पहले राज्य सरकार को शक्ति परीक्षण का मौका देना होगा।'
  • सर्वोच्च न्यायालय ने 11 मार्च, 1994 को दिया था राज्यों में सरकारें भंग करने की केंद्र सरकार की शक्ति को कम करने वाला ऐतिहासिक बोम्मई जजमेंट।
  • धारा 356 के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिये दिये गए इस फैसले को ही बोम्मई जजमेंट के नाम से जाना जाता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 356 के व्यापक दुरुपयोग पर विराम लगा दिया।
  • इस मामले में 9-सदस्यीय संविधान पीठ ने राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने के संदर्भ में दिशा-निर्देश तय किये।
  • यह निर्णय भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने यह तय कर दिया कि बहुमत होने-न होने का फैसला सदन में होना चाहिये, राजभवन में या कहीं और नहीं।
  • बोम्मई जजमेंट का असर तब देखने को मिला था जब 1997 और 1998 में तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने धारा 356 के इस्तेमाल से उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारों को बर्खास्त करने के केंद्र के प्रस्ताव को वापस भेज दिया था।
बोम्मई जजमेंट के बाद विधानसभाओं को भंग करने का सिलसिला तो लगभग खत्म हो चुका है, लेकिन राज्यपालों के माध्यम से अपनी पसंद की सरकार बनवाने का प्रयास केंद्र की तरफ से जारी है।

राज्यपाल

मुख्यमंत्री की नियुक्ति

राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है [अनुच्छेद 164(1)] एक संवैधानिक उपबंधनों के अनुसार राज्यपाल बहुमत दल के नेताओं को मुख्यमंत्री नियुक्त करेगा| परंतु जब किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ हो तो राज्यपाल ने मनमाने तरीके से मुख्यमंत्री की नियुक्ति की है| अनेक बातों राज्यपाल ने बहुमत प्राप्त दल की उपेक्षा करते हुए अनुमति प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त कर विवेकाधिकार शक्ति का दुरुपयोग किया है उदाहरण –
  • वर्ष 1967 में राजस्थान के राज्यपाल संपूर्णानंद ने संयुक्त मोर्चा के कांग्रेस से अधिक सीटें प्राप्त होने के बावजूद कांग्रेस को आमंत्रित किया |
  • वर्ष 1982 में हरियाणा में बहुमत दल की उपेक्षा करते हुए राज्यपाल ने अल्पमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई |
  • वर्ष 2005 में बिहार विधानसभा के चुनावों के बाद बूटा से ने सबसे बड़े दल राजग की उपेक्षा कर राज्य में जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई जो विधानसभा में अपना बहुमत सिद्ध नहीं कर पाए |

मुख्यमंत्री की पदच्युति

  • वर्ष 1997 में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रोमेश भण्डारी ने बहुमत प्राप्त मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को हटाकर  अल्पमत प्राप्त जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई |
  • इसी प्रकार गोवा के राज्यपाल एस सी जमीर ने 2 फरवरी 2005 को मुख्यमंत्री मनोहर पारिकर भाजपा की सरकार को बर्खास्त कर कांग्रेस के प्रताप सिंह राणे को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई |

विश्वास मत के लिए समय देना वह कहना

  • झारखंड के राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबू सोरेन को लंबा समय दिया जिसकी आलोचना उच्चतम न्यायालय ने की |
  • अनेक बार राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को अचानक 24 घंटे के अंदर बहुमत सिद्ध करने के लिए कहा, यह भी उचित प्रतीत नहीं होता है |इस प्रकार राज्यपाल ने अपनी इस विवेकाधिकार शक्ति का दुरुपयोग किया है |

विधानसभा को भंग करने का अधिकार

  • संविधान के अनुच्छेद 174(2) के अनुसार राज्यपाल समय-समय पर किसी सदन का सत्रावसान कर सकेगा अथवा विधानसभा का विघटन कर सकेगा किंतु इस संबंध में स्वविवेेक के प्रयोग का अवसर प्राप्त होता है|
  • जब दल बदल के कारण या अन्य किसी कारण से सरकार अल्पमत में रह गई हो भारतीय राजनीति में ऐसे अनेक अवसर आए हो जब राज्यपाल ने इस परिस्थिति का लाभ लेकर मुख्यमंत्री की सिफारिश के बिना विधानसभा को भंग किया है |
  • जैसे वर्ष 1976 में मुख्यमंत्री से परामर्श के राज्यपाल ने तमिलनाडु की विधानसभा को भंग कर दिया था वर्ष 1989 में कर्नाटक के राज्यपाल वैकट सुवैया ने मुख्यमंत्री बोम्मई की सलाह के बिना विधानसभा भंग कर राष्ट्रपति शासन लागू करने में अपने इस अधिकार का दुरुपयोग किया |

राष्ट्रपति शासन की सिफारिश

  • अनुच्छेद 356 के अनुसार यदि राज्य सरकार संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलती है तो राज्यपाल राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकता है जैसे – मई 2005 में बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह ने राजग (NDA) जोकि सबसे बड़ा दल था, को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किया अपितु लालू यादव (RJD) को किया  |

राष्ट्रपति के लिए विधायकों को आरक्षित करना

  • राज्यपाल को केंद्र राज्य संबंधों को प्रभावित करने वाले विधायकों को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित रख सकता है (अनुच्छेद 200)| परंतु इस विवेकाधिकार का प्रयोग अनेक बार राज्यपाल ने केंद्र सरकार के इशारों पर राज्य सरकार के कार्यों को प्रभावित करने के लिए किया है |

मुख्यमंत्री के विरुद्ध मुकदमा दायर करने की अनुमति देना

  • संविधान के अनुसार राज्यपाल की अनुमति के बिना मुख्यमंत्री के विरुद्ध मुकदमा दायर नहीं किया जा सकता है| वर्ष 1995 में ‘जयललिता प्रकरण’ से यह स्पष्ट हो गया कि जब कोई पक्ष भ्रष्टाचार या किन्हीं आरोपों के आधार पर इस संबंध में निर्णय ले सकता है अर्थात अनुमति दे भी सकता है और नहीं भी दे सकता है |
  • वर्तमान समय में जब अनेक मुख्यमंत्रियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप है, तब राज्यपाल की यह शक्ति व्यवहारिक राजनीति में बहुत अधिक महत्व प्राप्त कर लेती है| लेकिन राज्यपाल के स्वविवेक के आधार पर लिए गए निर्णय को उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है राज्यपाल ने अपनी इस विवेकाधिकार शक्ति का भी अनेकों बार दुरूपयोग किया है |

मौलिक कर्त्तव्य

मौलिक कर्त्तव्य (Fundamental Duties):

fUNDAMENTAL DUTIES
  • स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा मौलिक कर्त्तव्यों को संविधान में शामिल किया गया।
  • इसके तहत संविधान में एक नए भाग IV को जोड़ा गया। संविधान के इस नए भाग में अनुच्छेद 51 क जोड़ा गया जिसमें 10 मौलिक कर्त्तव्यों को रखा गया था। वर्ष 2002 में 86वें संविधान संशोधन द्वारा एक और मौलिक कर्त्तव्य को जोड़ा गया-
  1. संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज एवं राष्ट्रीय गान का आदर करें।
  2.  
  3. स्वतंत्रता के लिये राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोये रखें और उनका पालन करें।
  4.  
  5. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करें तथा उसे अक्षुण्ण रखें।
  6.  
  7. देश की रक्षा करें और आह्वान किये जाने पर राष्ट्र की सेवा करें।
  8.  
  9. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भातृत्व की भावना का निर्माण करें जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग आधारित सभी प्रकार के भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हैं।
  10.  
  11. हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्त्व समझें और उसका परिरक्षण करें।
  12.  
  13. प्राकृतिक पर्यावरण जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव आते हैं, रक्षा करें और संवर्द्धन करें त्तथा प्राणीमात्र के लिये दया भाव रखें।
  14.  
  15. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।
  16.  
  17. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें।
  18.  
  19. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र प्रगति की और निरंतर बढ़ते हुए उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू ले।
  20.  
  21. 6 से 14 वर्ष तक की आयु के बीच के अपने बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना। यह कर्त्तव्य 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया।

42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 1976:

  • यह संविधान का सबसे महत्त्वपूर्ण संशोधन माना जाता है। इसे लघु संविधान के रूप में जाना जाता है। इसके तहत कुछ अन्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण संशोधन किये गए-
  • इस संशोधन के तहत भारतीय संविधान में तीन नए शब्द ‘समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष एवं अखंडता’ जोड़े गए।
  • इसमें राष्ट्रपति को कैबिनेट की सलाह की लिये बाध्यता का उपबंध शामिल किया गया।
  • इसके तहत संवैधानिक संशोधन को न्यायिक प्रक्रिया से बाहर किया गया और नीति निर्देशक तत्त्वों को व्यापक बनाया गया।
  • शिक्षा, वन, वन्यजीवों एवं पक्षियों का संरक्षण, नाप-तौल और न्याय प्रशासन तथा उच्चतम और उच्च न्यायालय के अलावा सभी न्यायालयों के गठन और संगठन के विषयों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित किया गया।

संविधान दिवस:

संविधान सभा द्वारा 26 नवंबर 1949 को संविधान के प्रारूप को पारित किया गया, इस दिन को भारत में संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है।

लोकसभा / राज्यसभा


क्र.सं.
लोकसभा
राज्यसभा
1.
इसके सदस्य आम जनता द्वारा वयस्क मतदान की प्रक्रिया के तहत चुने जाते हैं|
इसके सदस्य राज्य विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं|
2.
लोक सभा का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है|
यह एक स्थायी सदन है जिसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो साल बाद रिटायर हो जाते हैं|
3.
इसकी अधिकतम सदस्य संख्या 552 है|
इसकी अधिकतम सदस्य संख्या 250 है|
4.
धन विधेयक को केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है। यह सदन देश में शासन चलाने हेतु धन आवंटित करता है|
धन विधेयक के संबंध में राज्यसभा को अधिक शक्तियां प्राप्त नहीं है|
5.
केन्द्रीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है|
केन्द्रीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्यसभा के प्रति उत्तरदायी नहीं होती है|
6.
लोकसभा के बैठकों की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करते हैं|
राज्यसभा की बैठकों की अध्यक्षता उप-राष्ट्रपति करते हैं |
7.
इसे निचला सदन या आम जनता का सदन कहा जाता है|
इसे ऊपरी सदन या ‘राज्यों की परिषद्’ कहा जाता है|
8.
यदि कैबिनेट मंत्री द्वारा प्रस्तुत कोई विधेयक इस सदन में पारित नहीं हो पाता है, तो पूरी कैबिनेट को इस्तीफा देना पड़ता है।
यदि कैबिनेट मंत्री द्वारा प्रस्तुत कोई विधेयक इस सदन में पारित नहीं हो पाता है, तो पूरी कैबिनेट को इस्तीफा नहीं देना पड़ता है।
9.
भारत के राष्ट्रपति इस सदन में आंग्ल-भारतीय समुदाय के 2 सदस्यों को मनोनीत कर सकते हैं।
भारत के राष्ट्रपति इस सदन में कला, शिक्षा, समाजसेवा एवं खेल जैसे क्षेत्रों से संबंधित 12 सदस्यों को मनोनीत कर सकते हैं|
10.
लोकसभा का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु-सीमा 25 वर्ष है|
राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु-सीमा 30 वर्ष है|

CAG(नियंत्रक और महालेखापरीक्षक)

भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक

    भारत का नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (CAG-कैग) संभवतः भारत के संविधान का सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी है। वह ऐसा व्यक्ति है जो यह देखता है कि संसद द्वारा अनुमन्य खर्चों की सीमा से अधिक धन खर्च न होने पाए या संसद द्वारा विनियोग अधिनियम में निर्धारित मदों पर ही धन खर्च किया जाए।”
-डॉ. भीम राव अम्बेडकर
  • भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (Comptroller & Auditor General of India-CAG) भारत के संविधान के तहत एक स्वतंत्र प्राधिकरण है।
  • यह भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा विभाग (Indian Audit & Accounts Department) का प्रमुख और सार्वजनिक क्षेत्र का प्रमुख संरक्षक है।
  • इस संस्था के माध्यम से संसद और राज्य विधानसभाओं के लिये सरकार और अन्य सार्वजनिक प्राधिकरणों (सार्वजनिक धन खर्च करने वाले) की जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है और यह जानकारी जनसाधारण को दी जाती है।

पृष्ठभूमि

  • महालेखाकार का कार्यालय वर्ष 1858 में स्थापित किया गया था, ठीक उसी वर्ष जब अंग्रेज़ों ने ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत का प्रशासनिक नियंत्रण अपने हाथों में लिया था।
  • वर्ष 1860 में सर एडवर्ड ड्रमंड को पहले ऑडिटर जनरल के रूप में नियुक्त किया गया। इसके कुछ समय बाद भारत के महालेखापरीक्षक को भारत सरकार का लेखा परीक्षक और महालेखाकार कहा जाने लगा।
  • वर्ष 1866 में इस पद का नाम बदलकर नियंत्रक महालेखा परीक्षक कर दिया गया और वर्ष 1884 में इसे भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक के रूप में फिर से नामित किया गया।
  • भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत महालेखापरीक्षक को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया क्योंकि इस पद को वैधानिक दर्जा दिया गया था।
  • भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने संघीय ढाँचे में प्रांतीय लेखा परीक्षकों के लिये प्रावधान करके महालेखापरीक्षक के पद को और शक्ति दी।
  • इस अधिनियम में नियुक्ति और सेवा प्रक्रियाओं का भी उल्लेख था और भारत के महालेखापरीक्षक के कर्त्तव्यों का संक्षिप्त विवरण भी।
  • वर्ष 1936 के लेखा और लेखा परीक्षा आदेश ने महालेखापरीक्षक के उत्तरदायित्वों और लेखा परीक्षा कार्यों का प्रावधान किया।
  • यह व्यवस्था वर्ष 1947 तक अपरिवर्तित रही। स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 148 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा एक नियंत्रक और महालेखापरीक्षक नियुक्त किये जाने का प्रावधान किया गया।
  • वर्ष 1958 में CAG के क्षेत्राधिकार में जम्मू और कश्मीर को शामिल किया गया।
  • वर्ष 1971 में केंद्र सरकार ने नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (कर्त्तव्य, शक्तियाँ और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971 लागू किया।
  • अधिनियम ने CAG को केंद्र और राज्य सरकारों के लिये लेखांकन और लेखा परीक्षा दोनों की ज़िम्मेदारी दी।
  • वर्ष 1976 में CAG को लेखांकन के कार्यों से मुक्त कर दिया गया।

ब्रिटेन के CAG से तुलना

  • भारत का CAG केवल महालेखापरीक्षक की भूमिका निभाता है, नियंत्रक महालेखाकार की नहीं, जबकि ब्रिटेन में महालेखापरीक्षक के साथ-साथ इसमें नियंत्रक महालेखाकार की शक्ति भी निहित होती है।
  • भारत में CAG पैसा खर्च होने के बाद खातों का लेखा-जोखा करता है यानी पोस्ट-फैक्टो, जबकि UK में CAG की मंज़ूरी के बिना सरकारी खजाने से कोई पैसा निकाला ही नहीं जा सकता है।
  • भारत में CAG संसद का सदस्य नहीं होता, जबकि ब्रिटेन में कैग हाउस ऑफ कॉमंस का सदस्य होता है।

संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 148 CAG की नियुक्ति, शपथ और सेवा की शर्तों से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 149 भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक के कर्त्तव्यों और शक्तियों से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 150 कहता है कि संघ और राज्यों को खातों का विवरण राष्ट्रपति के अनुसार (CAG की सलाह पर) रखना होगा।
  • अनुच्छेद 151 कहता है कि संघ के खातों से संबंधित CAG की रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी जाएगी, जो संसद के प्रत्येक सदन के पटल पर रखी जाएगी।
  • अनुच्छेद 279- ‘शुद्ध आय’ की गणना CAG द्वारा प्रमाणित की जाती है, जिसका प्रमाणपत्र अंतिम माना जाता है।
  • तीसरी अनुसूची- भारत के संविधान की तीसरी अनुसूची की धारा IV भारत के CAG और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा पदभार ग्रहण के समय ली जाने वाली शपथ का प्रावधान करती है।
  • छठी अनुसूची के अनुसार, ज़िला परिषद या क्षेत्रीय परिषद के खातों को राष्ट्रपति और CAG द्वारा अनुमोदित प्रारूप के अनुसार रखा जाना चाहिये।
  • इन निकायों के खाते का लेखा-जोखा इस तरह से करना होगा जिस प्रकार CAG उचित समझता है और ऐसे खातों से संबंधित रिपोर्ट राज्यपाल को प्रस्तुत की जाएगी, जो विधानमंडल के समक्ष रखी जाती है।

कैग की स्वायत्तता

  • CAG की स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिये संविधान में कई प्रावधान किये गए हैं।
  • CAG राष्ट्रपति की सील और वारंट द्वारा नियुक्त किया जाता है और इसका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है। ( दोनों में से जो भी पहले हो)
  • CAG को राष्ट्रपति द्वारा केवल संविधान में दर्ज प्रक्रिया के अनुसार हटाया जा सकता है जो कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के तरीके के समान है।
  • एक बार CAG के पद से सेवानिवृत्त होने/इस्तीफा देने के बाद वह भारत सरकार या किसी भी राज्य सरकार के अधीन किसी भी कार्यालय का पदभार नहीं ले सकता।
  • CAG का वेतन और अन्य सेवा शर्तें नियुक्ति के बाद भिन्न (कम) नहीं की जा सकतीं।
  • उसकी प्रशासनिक शक्तियाँ और भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा विभाग में सेवारत अधिकारियों की सेवा शर्तें राष्ट्रपति द्वारा उससे परामर्श के बाद ही निर्धारित की जाती हैं।
  • CAG के कार्यालय का प्रशासनिक व्यय, जिसमें सभी वेतन, भत्ते और पेंशन शामिल हैं, भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं जिन पर संसद में मतदान नहीं हो सकता।

CAG के कार्य और शक्तियाँ

  • CAG को विभिन्न स्रोतों से ऑडिट करने के अधिकार प्राप्त हैं, जैसे-
    • संविधान का अनुच्छेद 148 से 151
    • नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (कर्त्तव्य, शक्तियाँ और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971
    • महत्त्वपूर्ण निर्णय
    • भारत सरकार के निर्देश
    • लेखा और लेखा-परीक्षा विनियम, 2017
  • CAG भारत की संचित निधि और प्रत्येक राज्य, केंद्रशासित प्रदेश जिसकी विधानसभा होती है, की संचित निधि से संबंधित खातों के सभी प्रकार के खर्चों का परीक्षण करता है।
  • भारत की आकस्मिक निधि और भारत के सार्वजनिक खाते के साथ-साथ प्रत्येक राज्य की आकस्मिक निधि और सार्वजनिक खाते से होने वाले सभी खर्चों का परीक्षण करता है।
  • केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के किसी भी विभाग के सभी ट्रेडिंग, विनिर्माण, लाभ- हानि खातों, बैलेंस शीट और अन्य अतिरिक्त खातों का ऑडिट करता है।
  • संबंधित कानूनों द्वारा आवश्यक होने पर वह केंद्र या राज्यों के राजस्व से वित्तपोषित होने वाले सभी निकायों, प्राधिकरणों, सरकारी कंपनियों, निगमों और निकायों की आय-व्यय का परीक्षण करता है।
  • राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा अनुशंसित किये जाने पर किसी अन्य प्राधिकरण के खातों का ऑडिट करता है, जैसे- कोई स्थानीय निकाय।
  • केंद्र और राज्यों के खाते जिस प्रारूप में रखे जाएंगे, उसके संबंध में राष्ट्रपति को सलाह देता है।
  • केंद्र के खातों से संबंधित अपनी ऑडिट रिपोर्ट को राष्ट्रपति को सौंपता है, जो संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखी जाती है।
  • किसी राज्य के खातों से संबंधित अपनी ऑडिट रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपता है, जो राज्य विधानमंडल के समक्ष रखी जाती है।
  • संसद की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) के मार्गदर्शक, मित्र और सलाहकार के रूप में भी कार्य करता है।

CAG और लोक लेखा समिति

(Public Accounts Committee- PAC)

  • लोक लेखा समिति भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत गठित एक स्थायी संसदीय समिति है।
  • CAG की ऑडिट रिपोर्ट केंद्र और राज्य में लोक लेखा समिति को सौंपी जाती है।
  • विनियोग खातों, वित्त खातों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर ऑडिट रिपोर्ट की जाँच लोक लेखा समिति द्वारा की जाती है।
  • केंद्रीय स्तर पर इन रिपोर्टों को CAG द्वारा राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है, जो संसद में दोनों सदनों के पटल पर रखी जाती हैं।
  • CAG सबसे ज़रूरी मामलों की एक सूची तैयार करके लोक लेखा समिति को सौंपता है।
  • CAG कभी-कभी राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों के विचारों की व्याख्या और अनुवाद भी करता है।
  • CAG यह देखता है कि उसके द्वारा प्रस्तावित सुधारात्मक कार्रवाई की गई है या नहीं। यदि नहीं तो वह मामले को लोक लेखा समिति के पास भेज देता है जो मामले पर आवश्यक कार्रवाई करती है।

चुनौतियाँ तथा अवसर

  • वर्तमान समय में सरकारी ऑडिट करना जटिल होता जा रहा है क्योंकि भ्रष्टाचार और प्रशासन में खामियों का पता लगाना आसान नहीं है।
  • केंद्र और राज्य सरकारों पर कड़ी नजर रखने के साथ ही CAG अब कई सार्वजनिक-निजी सहभागी परियोजनाओं (PPP) का ऑडिट भी करता है।
  • CAG की नियुक्ति के लिये कोई मानदंड या प्रक्रिया संविधान या कानून में निर्धारित नहीं की गई है।
  • कार्यपालिका को यह शक्ति दी गई है कि वह अपनी पसंद के व्यक्ति को CAG के रूप में नियुक्त कर सके। यह विश्व में प्रचलित तरीकों के साथ मेल नहीं खाता।
  • CAG को किसी भी सरकारी कार्यालय का निरीक्षण करने और किसी भी खाते को मांगने का अधिकार है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर ऐसा नहीं हो पाता।
  • इसके अलावा ऑडिट में बाधा डालने के उद्देश्य से महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों की आपूर्ति ऑडिट प्रक्रिया के अंत में की जाती है।
  • RTI अधिनियम 2005 के तहत नागरिकों के एक महीने के भीतर जानकारी प्राप्त करने के अधिकार की तरह ऑडिटरों को भी सात दिनों के भीतर प्राथमिकता के आधार पर रिकॉर्ड उपलब्ध किये जाने चाहिये। ऐसा नहीं हो पाने की स्थिति में संबंधित विभागों के प्रमुखों को इसकी वज़हों को स्पष्ट करना चाहिये।
  • वर्ष 2015 में संसद और राज्य/केंद्रशासित प्रदेशों के विधानमंडलों ने लोक लेखा समिति के अखिल भारतीय सम्मेलन में CAG की पूर्ण स्वायत्तता और लोक लेखा समिति का सदस्य बनाए जाने पर चर्चा की, जैसा कि UK और ऑस्ट्रेलिया में होता है।
  • हालाँकि भारतीय संविधान CAG को छह साल का कार्यकाल प्रदान करता है, लेकिन 65 साल उम्र की शर्त इसके वास्तविक कार्यकाल की अवधि को कम कर सकती है। कार्यकाल कम होने से नेतृत्व, निरंतरता और विशेषज्ञता की कमी के कारण संस्था के स्वतंत्र और उचित कामकाज में बाधा उत्पन्न होती है।
  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर UK के CAG और अमेरिका के नियंत्रक महाप्रबंधक का कार्यकाल क्रमशः 10 और 15 वर्ष होता है।
  • संघ और राज्यों के खातों के ऑडिट का काम वास्तव में Indian Audit and Accounts Department (IA&AD) के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा किया जाता है। हालाँकि भारत में IA&AD के कार्य को वैधानिक मान्यता नहीं दी गई है, जैसा कि UK के राष्ट्रीय लेखा परीक्षा कार्यालय (National Audit Office) में होता है।
  • IT एक्ट की तर्ज पर IA&AD को सांविधिक निकाय के रूप में मान्यता देने और शक्तियाँ प्रदान करने से ऑडिट की गुणवत्ता में सुधार होगा तथा IA&AD के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा किये गए कार्यों की विश्वसनीयता बढ़ेगी।

पूर्व CAG विनोद राय द्वारा सुझाए गए सुधार

  • CAG के दायरे में सभी निजी-सार्वजनिक सहभागी (PPP), पंचायती राज संस्थान और सरकार द्वारा वित्तपोषित संस्थानों को लाना चाहिये।
  • 1971 के CAG एक्ट में संशोधन किया जाना चाहिये ताकि शासन में बदलाव से ताल-मेल हो सके।
  • नया CAG चुनने के लिये मुख्य सतर्कता आयुक्त (CVC) के चयन की तरह एक कॉलेजियम जैसा तंत्र होना चाहिये।

तौर-तरीकों में बदलाव की ज़रूरत

  • हालिया समय में कुछ ऑडिट के दौरान नुकसान के बढ़े हुए अनुमानों या बाहरी आँकड़ों के कारण CAG की आलोचना हुई है। इस तरह के आरोपों से बचने के लिये CAG को कठोर मानकों का पालन करना चाहिये ताकि ऑडिट की अखंडता बाहरी विचारों से प्रभावित न हो।
  • सरकारी धन और सार्वजनिक वस्तुओं का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है। इसे रोकने के लिये CAG को अपने ऑडिट तंत्र में बदलाव करने चाहिये।
  • CAG को सतत विकास लक्ष्यों का ऑडिट करने और GST के कार्यान्वयन जैसे मुद्दों की जाँच के लिये तैयार किया जाना चाहिये।
  • बिग डेटा क्रांति के मद्देनज़र CAG ने वर्ष 2016 में बिग डेटा मैनेजमेंट पॉलिसी के साथ काम किया तथा दिल्ली में डेटा मैनेजमेंट एंड एनालिटिक्स के लिये एक केंद्र भी स्थापित किया।
  • CAG ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय का सफलतापूर्वक ऑडिट किया, जिसमें विविध जटिल कार्य शामिल थे। यह भारत के CAG की विश्वसनीयता को दर्शाता है।